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छलका दर्द: आतंकवाद में खोए अपने, लेकिन अब तक सुविधाओं के लिए भटक रहे पीड़ित, क्या काम आएगी सरकार की ये पहल

Sat, 07 Feb 2026 07:06 AM IST
अंकेश ठाकुर मोहित धुपड़, चंडीगढ़
मोहित धुपड़, चंडीगढ़ Published by: अंकेश ठाकुर Updated Sat, 07 Feb 2026 07:06 AM IST
सार

पंजाब में आतंकवाद के काले दौर में हजारों परिवार ऐसे थे, जिन्होंने अपनों को खो दिया। काफी पुलिस वालों ने आतंकियों से लोहा लेते हुए अपनी जान न्योछावर कर दी मगर ताज्जुब इस बात का है कि इनके आश्रित आज तक घोषित सुविधाओं के लिए भटक रहे हैं।

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Dependents of those martyred during period of terrorism in Punjab have not received promised benefits
पंजाब भवन में पीड़ित परिवारों के कुछ सदस्य। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

पंजाब में आतंकवाद के दौर में हजारों परिवार ऐसे थे जिन्होंने अपनों को खो दिया। काफी पुलिस वालों ने आतंकियों से लोहा लेते हुए अपनी जान न्योछावर कर दी लेकिन ताज्जुब इस बात का है कि इनके आश्रित आज तक घोषित सुविधाओं के लिए भटक रहे हैं।

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सरकारों ने इन परिवारों को जो देने का वादा किया था वे अभी तक नहीं मिल पाया है। ये आश्रित आज अपने साथ पक्षपात रवैये का भी आरोप लगाते हैं। पंजाब में 32,514 आतंकवाद पीड़ित और 2046 पुलिस शहीदों परिवार हैं। मौजूदा सरकार ने इन पीड़ितों की समस्याओं के समाधान के लिए पहल की है। 
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ऑल इंडिया टेररिस्ट विक्टिम एसोसिएशन व ऑल इंडिया माइग्रेंट फेडरेशन के प्रतिनिधिमंडल की एक बैठक पंजाब के राजस्व व पुनर्वास मंत्री हरदीप सिंह मुंडियां व अतिरिक्त मुख्य सचिव अनुराग वर्मा के साथ हुई। करीब एक घंटा चली इस बैठक में एसोसिएशन के चेयरमैन डॉ. बीआर हस्तिर और सतिंदर पाल सिंह सिद्धू ने पीड़ित परिवारों की समस्याओं व मांगों से उन्हें अवगत करवाया।
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बैठक में आतंकवाद पीड़ित आयोग गठित करने पर चर्चा की गई जिसके माध्यम से इन आश्रितों की समस्याओं का सरकारी स्तर पर समाधान किया जा सके। इस बारे में मंत्री मुंडियां मुख्यमंत्री से चर्चा करेंगे।

बैठक में हुई इन मांगों पर चर्चा

  • आतंकवाद में मारे गए लोगों के आश्रितों को 5 व पुलिस शहीदों के आश्रितों को 10 लाख रुपये वित्तीय मदद दी जाए।
  • आयोग का गठन किया जाए, पेंशन एवं गुजारा भत्ता 6 हजार बढ़ाकर 10 हजार रुपये प्रति माह किया जाए।
  • 23 जुलाई 2001 को तत्कालीन मुख्य सचिव की अध्यक्षता में हुए एक बैठक में आश्रितों के लिए कई घोषणाएं की गई थीं। साल 2002 के विधानसभा चुनाव की आचार संहिता की वजह से कई घोषणाएं लागू नहीं हुईं, उन्हें लागू करने की मांग।
  • कुछ पीड़ित परिवारों को प्लॉट दिए गए मगर बहुत से रह गए, उन्हें प्लॉट देने की मांग।
  • काफी पीड़ितों के पास रेड कार्ड नहीं है। उन्हें कोटे का लाभ भी नहीं मिल पाता।
  • एक्सग्रेशिया रिवाइज्ड नहीं हुआ और बच्चों को भी योग्य अनुसार नाैकरी नहीं मिली।

आंखों के सामने छह परिजन भून डाले
आतंकवाद के दौर में दर्द झेलने वाले लोगों के जख्म आज भी हरे हैं। सुशीला नेगी के पिता गवर्नर हाउस में नौकरी करते थे। वे अपने परिवार के साथ ससुराल जा रही थी। लालड़ू के पास माता रिक्खी देवी, पिता मातवर सिंह, पति फतेह सिंह, बेटा विनोद व जगमोहन व बेटी गीता को बस में उसके सामने आतंकियों ने गोलियां ने भून दिया था। उन्हें भी गोलियों के छर्रे लगे मगर वे बच गई। 12 साल नौकरी की मगर पेंशन नहीं मिली। प्लॉट भी नहीं मिला आज भी किराये पर रह रही हैं।

फाैज के शहीदों की तरह लाभ मिले
चरणजीत कौर के पति कश्मीर सिंह भी 27 जनवरी 1992 को आतंकियों से लोहा लेते हुए शहीद हुए थे। उन्हें भी बहादुरी पुरस्कार मिला मगर राज्य की ओर से सुविधाओं के लिए वे आज तक भटक रही हैं। फाैज में यदि कोई जवान शहीद होता है तो केंद्र व राज्य सरकार उनके आश्रितों को काफी लाभ देती है। इसी तरह पुलिस के शहीद जवान को भी मिलना चाहिए, क्योंकि पीड़ा और परेशानियां दोनों के आश्रितों के समक्ष एक जैसी होती हैं। एक्सग्रेशिया का आकलन ठीक से नहीं हुआ लिहाजा लाभ कम मिला। उन्हें कोई प्लाॅट भी नहीं मिला और पेंशन भी बहुत कम मिलती है।

घर फूंक दिया, पंजाब छोड़ना पड़ा
डाॅ. बीआर हस्तिर ने बताया कि उनके डीएसपी चाचा पंडित ताराचंद आतंकियों से लड़ते हुए 6 नवंबर 1987 को शहीद हुए। बटाला में कई बार उनके घर पर हमला हुआ और घर को आग लगा दी गई। दहशत की वजह से परिवार को पंजाब छोड़ना पड़ा। अंबाला और पानीपत के बाद दिल्ली में रहे। आतंकवाद का दाैर खत्म हुआ तो वापस अमृतसर आए। आश्रितों को कोई प्लाॅट नहीं हुआ। सुविधाओं के लिए बहुत से पीड़ित आज भी भटक रहे हैं।

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