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पितृ पक्ष के दौरान बंद रहेंगे मांगलिक कार्य, पितरों को तर्पण करने से दूर होती है पारिवारिक बाधा
न्यूज डेस्क,अमर उजाला,वाराणसी
Updated Mon, 24 Sep 2018 05:28 PM IST
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काशी विद्वत परिषद के संगठन मंत्री आचार्य ऋषि द्विवेदी ने बताया कि दैहिक, दैविक और भौतिक तीनों तापों से मुक्ति पाने के लिए श्राद्ध से बढ़कर कोई दूसरा उपाय नहीं है। सूर्यपुत्र यमदेव के बीस हज़ार वर्ष तक घोर तपस्या करने के बाद भगवान शिव ने उन्हें यमलोक और पितृलोक का अधिकारी बनाया। जो लोग गया पिंडदान करने जाते हैं, वह मोक्ष की नगरी काशी में भी पितरों के लिए पिंडदान करते हैं।
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काशी विद्वत परिषद के संगठन मंत्री पं. दीपक मालवीय के अनुसार वैसे तो किसी भी माह की जिस तिथि में परिजन की मृत्यु हुई हो, उसी तिथि में श्राद्ध करना चाहिए। इसके बाद भी कुछ ख़ास तिथियां भी हैं, जिनमे अलग-अलग तरह से मृत्यु होने वाले परिजन का श्राद्ध कर्म किया जाता है। इसमें नवमी तिथि को सौभाग्यवती महिला का। जहर, हत्या, दुर्घटना वाले लोगों का एकादशी के दिन, वहीं सर्पदंश, वज्रघात, जले, पशु से आक्रमण, फांसी लगाकर मृत्य, क्षय जैसे महारोग हैजा, डाकुओं के मारे जाने से हुई मृत्यु वाले लोगों का चतुर्दशी और अमावस्या के दिन तर्पण किया जाना चाहिए।
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पितृपक्ष में पितरों के अह्वान पर घर आ जाते हैं। ऐसे में जब ब्राह्मणों को भोजन कराया जाता है तो वे ब्राह्मणों के साथ ही भोजन करते हैं। भोजन से तृप्त होने के बाद पितर अपने परिवार के लोगों को आशीर्वाद देकर वापस स्वर्ग लोक चले जाते हैं। श्राद्ध में ब्राह्मण भोज का सबसे अच्छा समय दोपहर 11 बजकर 36 मिनट से लेकर 12 बजकर 24 मिनट तक के बीच का माना गया है। इस दौरान श्राद्ध तर्पण और ब्राह्मण भोजन सबसे अधिक फलदायी होता है।
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कर्मकांड के जानकार पंडित कामता प्रसाद पांडेय का कहना है कि श्राद्ध का मतलब श्रद्धा पूर्वक अपने पितरों को अर्पण करना है। हिंदू शास्त्रों के अनुसार जिस किसी के परिजन अपने शरीर को छोड़कर चले गए हैं, उनकी तृप्ति के लिए श्रद्धा के साथ जो शुभ संकल्प और तर्पण किया जाता है, उसे श्राद्ध कहा जाता है।