एक तरफ धधकती चिताएं और दूसरी ओर शिवभक्तों की अड़भंगी होली। ढोल, मजीरे और डमरुओं की थाप के बीच झूमते शिवगण और हर-हर महादेव के उद्घोष से वाराणसी के हरिश्चंद्र घाट का श्मशान गूंज उठा। भगवान शिव के गणों ने चिता भस्म की होली खेलकर मोक्ष की नगरी काशी में राग और विराग को एकाकार किया।
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चिता भस्म की होली।
- फोटो : अमर उजाला
इसके साथ ही काशी अब पूरी तरह होली के इंद्रधनुषी रंग में रंग गई है। सोमवार को शिव भक्तों ने रंगभरी एकादशी पर श्मशान पर चिता भस्म से होली खेली। बाबा के भक्तों की अनोखी होली देखने के लिए भी भीड़ उमड़ी। इससे पहले बाबा के गौना की बरात रवींद्रपुरी स्थित बाबा कीनाराम मठ से आरंभ हुई।
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चिता भस्म की होली।
- फोटो : अमर उजाला
काशी मोक्षदायिनी संस्था की ओर से निकाली गई यात्रा में डमरूदल की गर्जना के बीच हर-हर महादेव का जयघोष करते नाचते गाते शिवगणों का रूप धारण किए भक्तों की टोली हरिश्चंद्र घाट पहुंची। भगवान शिव व पार्वती के साथ नंदी, भृंगी, भूत, पिशाच, शृंगी, नाग, गंधर्व, देवता और किन्नरों की टोली शोभायमान हो रही थी।
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बाबा विश्वनाथ धाम में उमड़े भक्त।
- फोटो : अमर उजाला
उधर, रंगभरी एकादशी के दिन काशीवासियों ने बाबा विश्वनाथ और माता गौरा के संग होली खेली। सोमवार को ब्रह्म मुहूर्त में बाबा की चल प्रतिमा के पूजन के बाद आरती के साथ ही रंगभरी उत्सव का श्रीगणेश हो गया। देवी पार्वती और गणेश के साथ चिनार और अखरोट की लकड़ी से बनी रजत जड़ित पालकी पर प्रतिष्ठित करके बाबा की चल प्रतिमा काशी विश्वनाथ मंदिर के गर्भगृह में ले जाई गई।
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बाबा विश्वनाथ के स्वागत को उमड़े लोग।
- फोटो : अमर उजाला
पालकी यात्रा के दौरान इतना गुलाल और अबीर उड़ाया गया कि महंत आवास से मंदिर प्रांगण तक करीब 500 मीटर के बीच जमीन पर अबीर-गुलाल की परत जम गई। बाबा का सिंहासन रखने के लिए बिछाई गई हरी कालीन पहले गुलाल की बौछार से लाल हुई फिर भभूत से सफेद हो गई। शृंगार और भोग आरती के बाद महंत आवास विशेष कक्ष में बाबा का शृंगार कर श्रद्धालुओं के लिए खोला गया।