निर्भया गैंगरेप केस के चार दोषियों को 22 जनवरी को सुबह 7 बजे फांसी दी जाएगी। तिहाड़ जेल नंबर-3 में दोषियों को फांसी देने की तैयारियां जारी हैं। वहीं फांसी की प्रक्रिया को लेकर अलग-अलग भ्रांतियां है। इस संबंध में यूपी के पूर्व डीजीपी ने फांसी देने की प्रक्रिया को लेकर सोशल मीडिया पर विशेष जानकारी साझा की। कानूनी प्रावधान के अनुरूप फांसी देने की प्रक्रिया से जुड़े ये महत्वपूर्ण तथ्य आप शायद ही जानते हों: -
फांसी से पहले दोषी की अंतिम इच्छा पूछे जाने का नहीं है कोई प्रावधान, मृत्युदंड से जुड़े अनजाने तथ्य
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गोवा पुर्तगाल के अधीन था और पुर्तगाल में फांसी की सजा नहीं थी। इसलिए गोवा में फांसीघर भी नहीं था। आजादी के बाद जब पहली बार फांसी देने की नौबत आई तो इस पर गहन अध्ययन किया गया। कई देशों और भारत के राज्यों के अध्ययन के बाद यह निष्कर्ष निकला कि फांसी का भारतीय तरीका सर्वश्रेष्ठ है। इससे दर्द और तकलीफ रहित तत्क्षण मौत होती है।
तत्क्षण मृत्यु इसलिये होती है कि सजायाफ्ता व्यक्ति को उसके वजन के अनुसार 'झटका' (ड्रॉप) दिया जाता है। इस 'ड्राप' के कारण व्यक्ति की मेरुतंत्रिका (स्पाइनल कॉर्ड) तुरंत टूट जाती है और उसे तकलीफ का अहसास नहीं होता। फांसी के दौरान यह देखना होता है कि व्यक्ति की मृत्यु स्पाइनल कॉर्ड फ्रैक्चर से हो न कि दम घुटने (asphyxiation) से। दम घुटने से मृत्यु बहुत देर बाद और तकलीफ-देह होती है।
पूर्व डीजीपी सुलखान सिंह के अनुसार उन्होंने एक अनुभवी जल्लाद से बात की है। उनके अनुसार अगर सही फांसी लगी तो शरीर शांत लटका रहता है। यदि गलती हो गई तो श्वासावरोध (एस्फिक्सिएशन ) होता है और व्यक्ति के पैर देर तक कांपते रहते हैं।
उत्तर प्रदेश जेल मैनुअल के पैरा 398 के अनुसार दोषी के वजन के अनुसार रस्सी का झटका रखा जाएगा। इसका मानक पैरा 398 में निम्नवत दिया गया है-
1. वजन 100 पौण्ड तक - 7 फुट
2. वजन 120 पौण्ड तक - 6 फुट
3. वजन 140 पौण्ड तक - 5 फुट 6 इंच
4. वजन 160 पौण्ड तक - 5 फुट
- ड्राप का तात्पर्य है कि रस्सी उतनी ढीली/अतिरिक्त रखी जाती है, ताकि जब तख्ते हटें तो शरीर अचानक उतना नीचे गिरे। इस झटके से ही स्पाइनल कॉर्ड टूटती है।
- शरीर ड्राप होने के बाद आधा घंटा लटका रहना चाहिए। जब डाक्टर प्रमाणित कर दे की जीवन समाप्त हो गया है तब शरीर रस्सी से उतारकर नीचे रखा जाना चाहिए।
- फांसी के बाद पहले पोस्टमार्टम जांच नहीं की जाती थी परन्तु अब न्यायिक निर्णय और मानवाधिकार आयोग के निर्देशानुसार अन्त्यपरीक्षण जरूरी है, हालांकि अभी तक उत्तर प्रदेश जेल मैनुअल में संसोधन नहीं किया गया है।
फांसी के बारे में कुछ अन्य प्रावधान
- कारागार अधीक्षक स्वयं सारी व्यवस्था करेंगे। अधीक्षक एक दिन पूर्व शाम को रस्सी और फांसी, प्लेटफार्म इत्यादि की जांच कर लेंगे।
- रस्सी की जांच के लिये एक बोरे में 80 किलोग्राम बालू भर कर उसे एक तिपाई पर रखा जाता है। तिपाई सहित बोरे के मुंह तक ऊंचाई तख्ते से लगभग पांच फुट होनी चाहिए।
- फांसी के लिए एक इंच व्यास की मनीला रस्सी का प्रयोग किया जाता है। जहां फांसी घर हैं वहां कम से कम पांच रस्सियां रखी जाती हैं।
- हर तीन महीने बाद और प्रत्येक फांसी के बाद रस्सी पर बराबर मात्रा में मधुमक्खी का मोम और घी तथा कार्बोलिक एसिड मिलाकर लगाया जाता है और उसे एक घड़े में रखकर मुंह अच्छी तरह बन्द करके एक पतली रस्सी से छत से लटकाकर रख दिया जाता है।
- जिला मजिस्ट्रेट या उप-जिला मजिस्ट्रेट उपस्थित रहेगा। एक निरीक्षक/उप-निरीक्षक, दो हेड कांस्टेबल और बारह कांस्टेबल की सशस्त्र गार्ड मौजूद रहेगी।