उत्तर प्रदेश के शामली में अवैध रूप से रह रहे अब्दुल मजीद के पास पहचान पत्र पश्चिम बंगाल का था और आधार कार्ड जलालाबाद का। बावजूद इसके वह करीब छह संस्थाओं काम करता रहा, लेकिन किसी को इनके कागजों पर भी संदेह नहीं हुआ। आखिर उसने कैसे भारतीय दस्तावेज बनवा लिए इसकी जांच पड़ताल खुफिया एजेंसियां करने में जुटी हुई हैं: -
बंगाल का पहचानपत्र, जलालाबाद का आधार कार्ड, अब्दुल मजीद ने आखिर कैसे बनवाए भारतीय दस्तावेज
अब्दुल मजीद का मामला कई कारणों से आश्चर्यजनक बना हुआ है। पुलिस व खुफिया विभाग ने अब्दुल मजीद को गिरफ्तार किया तो उसके पास से जो पहचान पत्र बरामद हुआ वह पश्चिम बंगाल के सोनाकोपा के रामेश्वरपुर में बनाया हुआ है। जबकि, जो आधार कार्ड पुलिस को बरामद हुआ। उसमें पते के कॉलम में दिल्ली-सहारनपुर हाईवे खुशनुमा कॉलोनी जलालाबाद दर्ज है।
भारत में घुसने के बाद मजीद का शुरूआती दौर पश्चिम बंगाल में गुजरा, इसके बाद उज्जैन में। इस दौरान मजीद ने कर्नाटक के मदरसों में पढ़ाया। इसके अलावा उज्जैन, झिंझाना और जलालाबाद के दो मदरसों में रहकर अब्दुल मजीद ने छात्रों को पढ़ाया और संभवत उसने यही दस्तावेज जमा किए होंगे। अब सवाल है कि आखिर किसी भी संस्था ने इन दोनों दस्तावेजों के अंतर नहीं समझा या फिर समझने का प्रयास ही नहीं किया।
आमतौर पर नागरिकों को कोई भी सरकारी दस्तावेज या प्रमाण पत्र बनवाने के लिए लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। मगर म्यांमार के मूल निवासी अब्दुल मजीद जो करीब 18 साल पहले भारत में अवैध रूप से सीमा पार कर घुसा था, उसने भारतीय दस्तावेज आधार कार्ड, पैन कार्ड, बैंक खाते, एटीएम कार्ड आदि हासिल कर लिए।
इतना नहीं नहीं जलालाबाद में मकान भी खरीद लिया गया। मकान खरीदते समय भी गवाहों की जरूरत पड़ी होगी। बैंक में खाता खुलवाने के लिए गारंटी देने वाले खाताधारक भी रहे होंगे। इसके अलावा टूरिस्ट वीजा पर आए तीनों छात्र भाई नोमान, रिजवान और फुरकान वीजा अवधि समाप्त के बाद वतन नहीं लौटे।
इसके बजाए उन्होंने अपनी पहचान छिपाई और नाम बदलकर संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायुक्त कार्यालय नई दिल्ली में शरणार्थी का दर्जा पाने को आवेदन कर लिया। ऐसे में कई विभागों की लापरवाही सामने आ रही है। जांच पड़ताल होने पर कई विभागीय अधिकारियों की पर गाज गिरनी संभव है।