1987 के सांप्रदायिक दंगे के दौरान मेरठ में अतिरिक्त एसएसपी (कानून व्यवस्था) की तैनाती की गई थी। दंगे शुरू होने के करीब डेढ़ माह बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह ने तब एसएसपी को यहां से हटाया था। इसी दौरान एक दिन के अंतराल से हाशिमपुरा और मलियाना नरसंहार भी हुए थे।
अप्रैल 1987 में मेरठ में सांप्रदायिक दंगों का दौर शुरू हुआ था। शुरूआती दंगों में दस लोगों की मौत हुई थी और इसके बाद छिटपुट हिंसा की घटनाओं के बीच मई के पहले पखवाड़े तक मेरठ में शांति स्थापित हो गई थी। तत्कालीन एसएसपी बीकेबी नायर थे और राज्य सरकार ने यहां कानून व्यवस्था का जिम्मा अतिरिक्त एसएसपी के रूप में गिरधारी लाल शर्मा को सौंपा था।
22 मई 1987 को हाशिमपुरा की घटना के अगले दिन 23 मई को मलियाना में नरसंहार हुआ था। इसमें पीएसी पर 106 घर जलाने और 72 लोगों को मार डालने का आरोप था। हालांकि हाशिमपुरा की घटना का खुलासा बाद में हुआ था। हाशिमपुरा में पीएसी के जवान से छीनी गई राइफल की तलाश में सेना के नेतृत्व में अर्द्धसैनिक बलों और पीएसी ने अभियान चलाया था।
खास बात यह है कि चंद्रशेखर सरीखे कद्दावर विपक्ष के नेता तब तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी से दंगों की निष्पक्ष जांच और अफसरों को तत्काल हटाने की मांग कर इसे पार्लियामेंट में भी उठा चुके थे। विधानसभा में भी यह मामला गूंजा था, लेकिन राज्य सरकार ने एसएसपी को हाशिमपुरा और मलियाना कांड के पूरे एक हफ्ते बाद हटाने का फैसला किया था। एक जून 1987 को नायर का यहां से तबादला किया गया। उनके स्थान पर गिरधारी लाल शर्मा नए एसएसपी बनाए गए थे।
शर्मा ही वह आईपीएस अफसर हैं, जिन्होंने हाशिमपुरा कांड की सीबीसीआईडी जांच के दौरान कहा था कि हाशिमपुरा में सेना को सर्च व गिरफ्तारी अभियान चलाने का आदेश उन्होंने नहीं दिया था। यह सेना ने अपने स्तर पर चलाया था। जिसमें अर्द्धसैनिक बल और पीएसी भी शामिल थी। इस अभियान की कार्रवाई की सूचना भी सेना सीधे अपने मुख्यालय को देती थी।