एक ट्रक को रात करीब साढ़े नौ बजे हमलावर मुरादनगर गंग नहर पर ले गए। मैं उसी ट्रक में था। सबसे पहले ट्रक से उतारकर मोहम्मद यासीन (आरटीओ दफ्तर में कार्यरत चपरासी) को गोली मारी गईं। एक-एक करके सबको गोली मारकर नहर में डाल दिया। मेरी दाहिनी बगल में गोली लगी थी, जिस कारण मैं जिंदा रहा और झाड़ियां पकड़कर छिपा रहा। मेरे अलावा मोहम्मद नईम, बाबूदीन, मुजीबुर्रहमान और उस्मान भी उसमें बच गए थे, जबकि 42 लोग मारे गए थे।
हाशिमपुरा दंगा: जुल्फिकार की जुबानी बर्बरता की कहानी, उस लम्हे को यादकर छलक उठीं आंखें
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वो 'लम्हा' याद कर भर आती हैं आंखें
हमलावरों के जाने के बाद मैं मुरादनगर और फिर वहां से गाजियाबाद के तत्कालीन डीएम नसीम जैदी के पास पहुंचा। फिर सांसद शाहबुद्दीन और सुब्रमण्यम स्वामी से मुलाकात होने के बाद प्रेस वार्ता करके पुलिस की बर्बरता को उजागर किया था।
अशफाक का कहना है कि मुझे पुलिस वाले पकड़ कर सिविल लाइन थाने ले गए थे। वहां से अन्य लोगों के साथ अब्दुल्लापुर जेल और फिर फतेहगढ़ जेल ट्रांसफर कर दिया गया था। आज भी वह लम्हा याद कर आंखें भर आती हैं, जब पुलिस और मिलिट्री वालों ने बेकसूरों को घर से पकड़ा और यातनाएं दीं।
हाजी जहीरुद्दीन ने दावा किया कि मुझे पुलिस वाले पकड़ कर सिविल लाइन थाने ले गए थे। लोहे की रॉड मारकर मेरी टांग और एक बाजू तोड़ दी थी। इसके बाद जेल में डाल दिया था। ऐसा कृत्य करने वाले पुलिसकर्मियों को पहले ही सजा मिल जानी चाहिए थी।
दो गोली लगने पर भी बाबूद्दीन ने नहीं मानी हार
बाबूदीन के मुताबिक पीएसी के जवान जब लाशों को हिंडन नदी में फेंक कर चले गए, तो कुछ देर बाद लिंक रोड थाने के पुलिसकर्मी गश्त करते हुए आए। नदी किनारे खड़े होकर कहने लगे कि गोलियों की आवाज तो यहीं से आई थी, पर यहां कोई नजर नहीं आ रहा। बाबूदीन ने बताया कि पुलिसकर्मियों को देख कर वह घबरा गया और काफी दूर तक तैरता हुआ आगे बढ़ने लगा।
इस पर पुलिस वालों ने कहा कि कौन है बाहर आओ, नहीं तो गोली मार देंगे। बाबूदीन ने बताया कि जब उसे ये भरोसा हो गया कि ये पुलिस वाले दूसरे हैं, तब वह नदी से बाहर निकला और पूरी बात बताई। उन पुलिसकर्मियों ने वायरलेस से अधिकारियों को सूचना दी और उसे मोहननगर स्थित नरेंद्र मोहन अस्पताल ले जाकर भर्ती करा दिया था।
गोलियों की आवाज सुनकर आई थी स्थानीय पुलिस
हाशिमपुरा कांड की रिपोर्ट दर्ज कराने वाले बाबूदीन मूलरूप से बिहार के दरभंगा जिले के गांव धमसाहन के रहने वाले हैं। यहां हाशिमपुरा में पावरलूम फैक्ट्री में कारीगर हैं। उनका आरोप है कि मुरादनगर गंग नहर पर हमलावरों ने जब ट्रक में ही गोलियां बरसाईं, तो एक गोली उसकी बाईं तरफ बगल में लगी।
बाद में हिंडन नदी पर ट्रक में पड़े लोगों को उतारा गया। ट्रक से खींचकर उसे जमीन पर गिराया गया तथा एक और गोली मारी, जो दाहिनी बगल से पार हो गई थी। इसके बाद उसे और अन्य लोगों को हिंडन नदी में फेंक दिया गया था, लेकिन मैं झाड़ी पकड़ कर नदी किनारे आ गया था।
दो महीने में ही विधवा हो गई थीं दो महिलाएं
हाशिमपरा कांड में मारे गए नईम और कमरुद्दीन की शादी दो महीना पहले ही हुई थी। जब दोनों की मौत हो गई, तो उनकी पत्नी अपने मायके चली गईं। परिजनों ने उनका दूसरा निकाह करा दिया।आज भी इन परिवारों को कमरुद्दीन और नईम की मौत का सदमा है।
लोग कहते हैं कि पुलिस ने जो बर्बरता की, उसका दर्द भूलता नहीं है। वहीं, जरीना के पति जहीर अहमद (45) और बेटे जावेद (18) को भी मार दिया गया था। जरीना आज भी सदमे में रहती है। सुप्रीम कोर्ट ने पीड़ित परिवारों की याचिका पर सुनवाई के बाद मामला सितंबर 2002 में दिल्ली ट्रांसफर कर दिया था। जिला अदालत ने जुलाई 2006 में इस मामले में हत्या, हत्या का प्रयास, साक्ष्यों से छेड़छाड़ व आपराधिक साजिश की धाराओं में आरोप तय किए थे। मामले में 264 गवाह थे।