हाशिमपुरा कांड को 31 साल बीत चुके हैं लेकिन उस दंगे की तपिश लोगों के जेहन में आज भी जिंदा है। तीन माह लंबे कर्फ्यू और तनाव के दौर में जिंदगी के हर कोने को तबाह कर दिया था। बदअमनी और बेबसी के निशान तीन दशक बाद भी फीके नहीं पड़े।
कारोबार बर्बाद हो चुके थे। फसलें चौपट हो गई थीं। रसोई खाली हो चुकी थीं। कितने ही घरों में खाने के लाले पड़ गए थे। जिंदगी घर के कोनों में सिमटकर रह गई थीं। उस मंजर के चश्मदीद आज भी उस दौर को याद कर सहम जाते हैं।
ईव्ज चौराहा पर रेडीमेड गारमेंट का शोरूम चलाने वाले मधुप सिंहल बताते हैं कि उस समय वह ग्रेजुएशन कर रहे थे। रात दिन फायरिंग और पत्थरबाजी के बीच नारों का शोर था। इसके इतर अफवाहों ने भी लोगों में दहशत भर दी थी। गलियों में सिर्फ सेना के जवानों के बूटों की थाप सुनाई पड़ती थी। इस हिंसा ने आपसी प्यार को खत्म कर दिया था।
कोटला निवासी बलराज सिंह यादव ने बताया कि दंगे वाले दिन वह घर पर ही थे। उन्हें सूचना मिली की पास ही मदन पंसारी की दुकान के पास लाला नाथुमल पर चाकू से हमला कर दिया गया। आग की तरह फैली सूचना के बाद व्यापारी आनन फानन में दुकान बंद कर भागे। कोटला में यादव मंदिर के पास पीएसी तैनात कर दी। अगले ही दिन एक टेलर की चाकू मारकर हत्या कर दी गई। इसके बाद हालात बेकाबू हो गए। क्षेत्र में कर्फ्यू लगा दिया गया।
अपनों को ही किया तबाह
दंगे की वहशियत ने लोगों के दिल पत्थर कर दिए। दंगे के दौरान कई ऐसे लोग भी तबाह और बर्बाद हुए और मारे गए जो जिंदगी भर दुसरों की भलाई के लिए आगे रहे। हापुड़ रोड पर हुई हिंसा में एक ऐसे सर्जन व कंपाउंडर की हत्या कर दी गई जिसने सैंकड़ों लोगों की जिंदगी बचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। जिस वक्त उनकी हत्या कर दी गई तब वह दंगाइयों के ही मजहब के बीमार लोगों के इलाज के लिए जा रहे थे।