AI Bubble: एआई की तुलना 'डॉट-कॉम बबल' से क्यों हो रही है, अगर ये बुलबुला फूटा तो क्या होगा?
What Is AI Bubble:
आज हर कंपनी खुद को एआई से जोड़ रही है। ओपनएआई जैसी कंपनियों की वैल्यूएशन आसमान छू रही है। लेकिन दूसरी तरफ भारी छंटनी और बेतहाशा खर्च ने बाजार में गहरा डर पैदा कर दिया है। क्या एआई 90 के दशक के डॉट-कॉम बबल की तरह महज एक बुलबुला है? जानिए अगर यह बुलबुला फूटा तो दुनिया का क्या होगा।

एआई को इस सदी की सबसे बड़ी टेक क्रांतियों में से एक माना जा रहा है। इसे इंटरनेट के बाद सबसे बड़ा बदलाव बताया जा रहा है। आज हर नई टेक कंपनी अपने नाम के साथ AI लगाकर खुद को इस रेस में शामिल करना चाहती है। हालांकि, एआई की सच्चाई इस चकाचौंध से कुछ अलग ही नजर आ रही है। गूगल और माइक्रोसाफ्ट जैसी बड़ी टेक कंपनियों से लेकर कैब कंपनी उबर तक ने माना कि एआई में खर्च लगातार बढ़ रहा है। माइक्रोसॉफ्ट ने तो बढ़ते खर्च के वजह से क्लॉड (Claude) का सब्सक्रिप्शन की खत्म कर दिया।
वहीं, एक कंपनी ने दावा किया कि एआई की वजह से उसका साल भर का बजट केवल 4 महीने में ही खत्म हो गया। एआई में बढ़ते निवेश के वजह से गूगल, माइक्रोसॉफ्ट और मेटा जैसी ग्लोबल कंपनियां अब तक कुल 1 लाख से ज्यादा कर्मचारियों की छंटनी कर चुकी हैं। एआई से एक तरफ लोगों की नौकरियां दांव पर हैं, तो दूसरी ओर OpenAI और एंथ्रोपिक जैसी एआई कंपनियों की वैलुएशन अब 1 ट्रिलियन डॉलर को छूने जा रही है।
हालांकि, कई टेक एक्सपर्ट्स मानते हैं कि एआई के साथ वही होने वाला है जो 1990 के दशक में डॉट-कॉम (.com) कंपनियों के साथ हुआ था। कई एक्सपर्ट्स अंदाजा लगा रहे हैं कि डॉट-कॉम बबल जैसा ही एआई का बुलबुला भी जल्दी ही फूटने वाला है। आइए विस्तार से समझते हैं कि इन दोनों दौर की तुलना आखिर क्यों की जा रही है और यदि एआई का यह बुलबुला फूटता है, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था पर इसके क्या परिणाम हो सकते हैं।

क्या था डॉट-कॉम बबल?
इकोनॉमिक्स में 'बबल' (बुलबुला) उस स्थिति को कहते हैं जब किसी एसेट या शेयर की कीमत उसकी वास्तविक कीमत से कई गुना अधिक बढ़ जाती है। 'डॉट-कॉम बबल' 1995 से 2000 के बीच का वह दौर था, जब इंटरनेट आधारित कंपनियों (जिनके नाम के आगे या पीछे .com लगा होता था) के शेयरों की कीमतों में अप्रत्याशित और अवास्तविक वृद्धि हुई थी।
इसे 'इंटरनेट बबल' या 'टेक बबल' भी कहा जाता है। इस दौरान हर वह कंपनी, जिसका संबंध इंटरनेट से था, शेयर बाजार में रातों-रात अरबों की बन रही थी, भले ही उसका कोई ठोस बिजनेस मॉडल या मुनाफा कमाने का कोई जरिया न हो।डॉट-कॉम बबल की शुरुआत कैसे हुई?इंटरनेट का नया दौर:90 के दशक में वर्ल्ड वाइड वेब (WWW) आम लोगों की पहुंच में आने लगा था। निवेशकों को लगा कि इंटरनेट ही भविष्य है और जो भी कंपनी ऑनलाइन जाएगी, वह अपार मुनाफा कमाएगी।
सस्ते कर्ज और वेंचर कैपिटल:
उस समय ब्याज दरें कम थीं और बाजार में पूंजी की कोई कमी नहीं थी। वेंचर कैपिटलिस्ट्स (Venture Capitalists) इंटरनेट स्टार्टअप्स में अंधाधुंध पैसा लगा रहे थे, बिना यह देखे कि कंपनी काम कैसे करेगी।
'ग्रोथ ओवर प्रॉफिट' की नीति:
कंपनियों का मुख्य फोकस मुनाफा कमाने के बजाय जल्द से जल्द अपना ग्राहक आधार बढ़ाना था। वे मार्केटिंग, विज्ञापन और छूट देने पर पानी की तरह पैसा बहा रही थीं।
बिना मुनाफे वाली कंपनियों के आईपीओ:
कई कंपनियां जो भारी घाटे में चल रही थीं, वे अपना आईपीओ (IPO) लेकर आईं और शेयर बाजार में लिस्ट होते ही उनके शेयर आसमान छूने लगे। टेक-हैवी अमेरिकी इंडेक्स नैस्डैक (NASDAQ) 1995 से 2000 के बीच 400% से ज्यादा बढ़ गया था।

जब टूटा इंटरनेट कंपनियों का तिलिस्म
डॉट-कॉम बबल के फटने का असर केवल अमेरिका ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के शेयर बाजारों पर पड़ा।
अरबों डॉलर का नुकसान:
अक्टूबर 2002 तक NASDAQ इंडेक्स अपने उच्चतम स्तर से लगभग 78% गिर चुका था। इस गिरावट में निवेशकों के करीब 5 ट्रिलियन डॉलर (5000 अरब डॉलर) डूब गए।
कंपनियां हुईं दिवालिया:
Pets.com, Webvan, eToys और Kozmo.com जैसी कई चर्चित और बड़ी कंपनियां रातों-रात दिवालिया होकर पूरी तरह बंद हो गईं।
दिग्गज कंपनियों को भी लगा झटका:
सिस्को (Cisco), अमेजन (Amazon) और क्वालकॉम (Qualcomm) जैसी मजबूत कंपनियों के शेयरों में भी 80 से 90 प्रतिशत तक की भारी गिरावट आई। हालांकि, इनके बिजनेस मॉडल मजबूत थे, इसलिए ये कंपनियां इस बड़े झटके से उबरने में सफल रहीं। अमेजन का शेयर जो 100 डॉलर से ऊपर था, वह गिरकर 6 डॉलर से भी नीचे आ गया था।
भारत पर डॉट कॉम क्रैश का प्रभाव
भारत पर डॉट कॉम बबल के फटने का प्रभाव अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों की तुलना में काफी सीमित था। इसका मुख्य कारण यह था कि भारतीय शेयर बाजार उस समय टेक कंपनियों के शेयरों में बहुत अधिक निवेशित नहीं था। वैश्विक अनिश्चितता के चलते भारतीय शेयर बाजार को भी भारी नुकसान उठाना पड़ा और कई निवेशकों के पैसे डूब गए। हालांकि यह संकट इतना व्यापक नहीं था कि भारत में गंभीर आर्थिक मंदी आ सके।
- गूगल को हाईकोर्ट से बड़ा झटका: एक कंपनी के विज्ञापन में नहीं कर सकेगा दूसरे ब्रांड के ट्रेडमार्क का इस्तेमाल
- Jio का धमाका: सिर्फ 200 रुपये में 30GB डेटा, Live TV और 15 OTT एप्स का मजा!
- IRCTC या RailOne: ट्रेन टिकट बुकिंग के लिए कौन सा एप है आपके लिए बेस्ट? जानें दोनों का अंतर
- Tips: डेबिट या क्रेडिट कार्ड खोने पर बंद कैसे करवाएं? जानिए मिनटों में कार्ड ब्लॉक करने का आसान तरीका