हिंदू धर्म में किए जाने वाले 16 संस्कारों में से कर्णभेदन नौवां संस्कार है। कर्ण भेदन यानि कान छेदना या कान भेदन करना। इस संस्कार में बच्चे के कान को छिदवाया जाता है और सोने या चांदी एक सुनहरा तार पहना दिया जाता है। इसके साथ ही बालक के कल्याण और आने वाले जीवन की शुभ कामना के लिए मंत्रों का जाप किया जाता है। सनातन धर्म में हर कार्य के लिए दिन तिथि और मुहूर्त का बहुत ध्यान रखा जाता है। इसी तरह से कर्णभेदन संस्कार के लिए आपको मुहूर्त और विधि-विधान का ध्यान रखना चाहिए। तो चलिए जानते हैं कर्ण भेदन संस्कार का महत्व, विधि और समय...
हिंदू धर्म में क्यों किया जाता है कर्णभेदन संस्कार, जानिए महत्व और इसकी पूरी विधि
किस आयु में किया जाता है कर्णभेदन
शिशु के जन्म के बाद 12वें,13वें दिन या फिर बच्चे के 6 या 7 माह के हो जाने के बाद कर्णभेदन संस्कार करवाया जा सकता है। इसके अलावा जब बच्चा 5वें या 7वें वर्ष में होता तब भी कर्णभेदन संस्कार किया जा सकता है। कर्णभेदन संस्कार के लिए शुभ मूहूर्त की जानकारी के लिए किसी योग्य ज्योतिष से सलाह ले लेनी चाहिए।
शास्त्रों के अनुसार, जिसका कर्णवेध संस्कार नहीं किया जाता है, वह अपने रिश्तेदारों के अंतिम संस्कार का अधिकारी नहीं माना जाता है। शिशु की बौद्धिक उन्नति और शैक्षणिक विकास के लिए उपनयन संस्कार से पहले कर्णवेधन संस्कार करवाया जाता है। माना जाता है कि कर्णभेदन संस्कार से बच्चे की जीवन में आने वाली नकारात्मकता और समस्याएं दूर होती हैं।
कैसे करना चाहिए कर्णवेधन संस्कार