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गणेश चतुर्थी: गणेश जी पर तुलसी चढ़ाना क्यों है वर्जित? जानें इसके पीछे की पौराणिक वजह

Sun, 13 Sep 2026 11:22 PM IST
श्वेता सिंह धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला Published by: श्वेता सिंह Updated Sun, 13 Sep 2026 11:22 PM IST
सार

गणेश चतुर्थी पर भगवान गणेश को तुलसी चढ़ाना वर्जित माना जाता है। इसके पीछे एक रोचक पौराणिक कथा जुड़ी है। जानिए तुलसी और गणेश से जुड़ी इस मान्यता की पूरी कहानी।

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Ganesh Chaturthi The Mythological Story Behind Why Tulsi Is Not Offered to Lord Ganesha
गणेश चतुर्थी 2026 - फोटो : amar ujala

गणेश चतुर्थी भगवान गणेश की आराधना का विशेष पर्व है। इस दिन भक्त विधि-विधान से गणपति की पूजा करते हैं और उन्हें उनकी प्रिय चीजें जैसे मोदक, दूर्वा और लाल फूल अर्पित करते हैं। लेकिन पूजा से जुड़ी एक ऐसी मान्यता भी है, जिसके अनुसार भगवान गणेश को तुलसी अर्पित नहीं करनी चाहिए। आखिर इसके पीछे क्या कारण है और तुलसी को गणेश पूजा में वर्जित क्यों माना जाता है? इसके पीछे एक रोचक पौराणिक कथा बताई जाती है। 14 सितंबर की सुबह 7:06 बजे चतुर्थी तिथि शुरू होगी और 15 सितंबर की सुबह 7:44 बजे समाप्त होगी। भगवान गणेश का प्राकट्य मध्याह्न काल में माना जाता है, इसलिए 14 सितंबर को ही गणेश चतुर्थी मनाई जाएगी। इसी दिन घरों और पंडालों में गणपति की स्थापना की जाएगी।


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गणेश जी और तुलसी से जुड़ी पौराणिक कथा
पौराणिक मान्यता के अनुसार, एक बार भगवान गणेश नदी के किनारे एकांत में बैठकर गहन ध्यान कर रहे थे। उसी समय वहां से देवी तुलसी का गुजरना हुआ। भगवान गणेश के तेजस्वी स्वरूप और शांत व्यक्तित्व को देखकर तुलसी उनसे प्रभावित हो गईं। उनके मन में गणेश जी से विवाह करने की इच्छा उत्पन्न हुई और उन्होंने उनके सामने विवाह का प्रस्ताव रख दिया।

हालांकि, भगवान गणेश ने तुलसी के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया। उन्होंने बताया कि वह ब्रह्मचर्य का पालन कर रहे हैं और विवाह करने की इच्छा नहीं रखते हैं। गणेश जी के इस उत्तर से तुलसी को निराशा हुई और वह क्रोधित हो गईं। मान्यता है कि उन्होंने भगवान गणेश को श्राप देते हुए कहा कि उनका विवाह उनकी इच्छा के विरुद्ध होगा और उनके दो विवाह होंगे।

तुलसी के इस श्राप से भगवान गणेश भी क्रोधित हो गए। उन्होंने तुलसी को श्राप दिया कि उनका विवाह एक असुर से होगा। दोनों के बीच हुए इस श्राप-प्रतिश्राप के बाद तुलसी को अपनी भूल का एहसास हुआ। उन्होंने भगवान गणेश से क्षमा मांगी और अपने श्राप को वापस लेने का अनुरोध किया।
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इसके बाद भगवान गणेश ने तुलसी को समझाया और उन्हें वरदान दिया। मान्यता है कि गणेश जी ने कहा कि तुलसी भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण की अत्यंत प्रिय होंगी। उन्हें धार्मिक दृष्टि से विशेष सम्मान प्राप्त होगा और कलियुग में तुलसी को पवित्र एवं मोक्ष प्रदान करने वाली माना जाएगा।

हालांकि, इस वरदान के साथ भगवान गणेश ने यह भी कहा कि उनकी पूजा में तुलसी का प्रयोग नहीं किया जाएगा। इसी पौराणिक मान्यता के कारण गणेश जी को तुलसी अर्पित करना वर्जित माना जाता है। इसके बजाय गणपति की पूजा में दूर्वा चढ़ाने की परंपरा है। धार्मिक मान्यताओं में दूर्वा को भगवान गणेश का प्रिय माना गया है और गणेश पूजा में इसका विशेष महत्व बताया गया है। इस तरह गणेश जी और तुलसी से जुड़ी यह कथा न केवल तुलसी को गणेश पूजा में अर्पित न करने की मान्यता के पीछे की वजह बताती है, बल्कि हिंदू धर्म में तुलसी के विशेष धार्मिक महत्व को भी दर्शाती है।
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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।

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