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Shradh paksha 2020: कैसे मिलता है पितरों का आशीर्वाद, पढ़िए पूरी कथा

Wed, 02 Sep 2020 06:38 AM IST
Shashi Shashi ज्योतिष डेस्क, अमर उजाला
ज्योतिष डेस्क, अमर उजाला Published by: Shashi Shashi Updated Wed, 02 Sep 2020 06:38 AM IST
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श्राद्ध पितृ पक्ष 2020 - फोटो : Pitru Paksha

पितृ कभी भी अपनी संतानों को परेशान नहीं करना चाहते हैं, वे बहुत दयालु होते हैं। लेकिन संतानों की उपेक्षा से दुखी हो जाते हैं, क्योंकि संतान के द्वारा श्राद्धकर्म और पिंडदान आदि करने पर उन्हें तृप्ति मिलती है, और वे अपनी संतानों को धन-धान्य और खुश रहने का आशीर्वाद देते हैं। पितृ ये नहीं चाहते कि उनकी संतानें उनको तृप्त करने के लिए बहुत कुछ करें, वे श्रद्धा भाव से किए गए श्राद्ध के खुशी के साथ स्वीकारते हैं। कहा भी गया है कि श्रद्धा के बिना श्राद्ध अधूरा होता है। इसी से जुड़ी है श्राद्ध पक्ष की पौराणिक कथा, जानते हैं कि कैसे श्रद्धा भाव से प्रसन्न होकर पितर देते हैं अपना आशीर्वाद...

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श्राद्ध पितृ पक्ष 2020 (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : सोशल मीडिया

पौराणिक कथा के अनुसार जोगे और भोगे नाम के दो भाई थे। दोनों अलग-अलग घरों में रहा करते थे। जोगे के पास धन की कोई कमी न थी, लेकिन भोगे निर्धन था। दोनों भाई एक दूसरे से बहुत प्रेम करते थे। लेकिन जोगे की पत्नी को धन का अभिमान था, तो वहीं भोगे की पत्नी सुशील और शांत स्वाभाव की थी। जब पितृ पक्ष आने पर जोगे की पत्नी ने उससे पितरों का श्राद्ध करने के लिए कहा तो जोगे इसे व्यर्थ का कार्य समझकर टालने की कोशिश की, लेकिन जोगे की पत्नी केवल अपनी शान दिखाने के लिए श्राद्ध का कार्यक्रम रखना चाहती थी। ताकि वह अपने मायके पक्ष के लोगों को बुलाकर दावत कर सके। जोगे की पत्नी से उसने कहा कि मुझे कोई परेशानी न हो इसलिए आप ऐसा कह रहे हैं। लेकिन मैं सत्य कहती हूं, मुझे इसमें कोई परेशानी नहीं है, मैं भोगे की पत्नी को बुला लूंगी। हम दोनों मिलकर सारा काम कर लेंगी।
 

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श्राद्ध पितृ पक्ष 2020 (सांकेतिक तस्वीर)

दूसरे दिन भोगे की पत्नी सुबह आकर सारा कार्य करवाने लगी, उसने अनेक पकवान बनाए, फिर सभी काम निपटाने के बाद अपने घर वापस आ गई, क्योंकि उसे भी पितरों का तर्पण करना था। जब पितर भूमि पर उतरे जब वे जोगे के यहां गए तो देखा कि उसके ससुराल पक्ष के सभी लोग भोजन पर जुटे हुए हैं। वहां ये सब देखकर वे बहुत निराश हुए उसके बाद जोगे-भोगे के पितर भोगे के यहां गए, तो देखते हैं कि मात्र पितरों के नाम पर केवल 'अगियारी' दे दी गई है। पितर उसकी राख चाटते हैं, और भूखे ही नदी के तट पर पहुंच जाते हैं।

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श्राद्ध पितृ पक्ष 2020 (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : pitru paksha 2018

कुछ ही देर में सारे पितर अपने-अपने यहां का श्राद्ध ग्रहण करके इकट्ठे हो गए और बताने लगे कि उनकी संतानों ने किस-किस तरह से उनके लिए श्राद्धों के पकवान बनाए। जोगे-भोगे के पितरों ने भी अपना सारा कुछ बताया। उन्होंने सोचा कि अगर भोगे निर्धन न होता और श्राद्ध करने में समर्थ होता तो शायद उन्हें भूखा वापस नहीं आने पड़ता, क्योंकि भोगे के घर में तो खाने के लिए भी दो जून की रोटी नहीं थी। ये सारी बातें सोचकर पितरों को भोगे पर दया आ गई। अचानक से वे नाच-नाचकर गाने लगे कि भोगे के घर धन हो जाए, भोगे के घर धन हो जाए।

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श्राद्ध पितृ पक्ष 2020 (सांकेतिक तस्वीर)

सांझ का समय हो चला था, लेकिन भोगे के घर में खाने को कुछ भी नहीं था। उसके बच्चे भूखे थे। बच्चों ने अपनी मां से कहा कि भूख लगी है। तब उन्हें टालने के लिए गुस्से से गरज कर भोगे की पत्नी ने कहा कि जाओ आंगन में हौदी औंधी रखी है, उसे जाकर खोल लो उसमें जो भी मिल जाए आपस में  बांटकर खा लेना। बच्चे जब वहां जाकर हौदी देखते हैं, तो वे दौड़े-दौड़े मां के पास जाकर कहते हैं कि मां हौदी तो मोहरों से भरी पड़ी है। आंगन में आकर भोगे की पत्नी ने यह सब कुछ देखती है, तो उसके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहता है।

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