धर्मग्रंथों में कहा गया है कि-'श्रावणे पूजयेत शिवम्'। अर्थात श्रावण मास में शिव पूजा विशेष रूप से फलदाई है। भोले भंडारी थोड़ी सी भक्ति करने से जल्दी ही प्रसन्न होकर अपने भक्तों की मनोकामनाओं की पूर्ति करते हैं। एक श्लोक के अनुसार 'वेदः शिवः,शिवः वेदः'अर्थात वेद ही शिव हैं और शिव ही वेद हैं। काल के भी महाकाल भगवान शिव के बारे में लिखा है कि- 'सभी देवताओं की आत्मा में रूद्र उपस्थित हैं और सभी देवता रूद्र की आत्मा हैं'।
Sawan 2023: शिवजी को क्यों प्रिय हैं त्रिशूल, चन्द्रमा, डमरू, नाग, नंदी, त्रिपुंड और नंदी? जानें इनका महत्व
धर्म डेस्क, अमर उजाला
Published by: विनोद शुक्ला
Updated Sat, 24 Jun 2023 10:57 AM IST
सार
भगवान शिव का स्मरण करने मात्र से मन में जो एक छवि उभरती है वो एक वैरागी पुरुष की होती है। इनके एक हाथ में त्रिशूल, दूसरे हाथ में डमरु, गले में सर्प माला, सिर पर त्रिपुंड चंदन लगा हुआ है।
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