तुलसीदास जी ने रामचरित मानस में कई ऐसे रहस्यों से पर्दा हटाया है और बताया है कि मनुष्य रूप में जन्म लेकर व्यक्ति कैसे अपने जीवन को सफल कर सकता है और किस तरह के कर्मों से मनुष्य को जीते जी और मरने के बाद कष्ट भोगना पड़ता है। यहां रामचरित मानस के एक ऐसे प्रसंग की चर्चा कर रहे हैं जहां रावण को बालि के पुत्र अंगद ने सही राह दिखाने का प्रयास किया था और बताया था कि कौन सा मनुष्य जीते जी मरे हुए के समान हो जाता है। रावण यह बात नहीं समझ पाया इसलिए उसे अपने सामने अपने पुत्रों को मरते हुए और अपनी संपत्ति और वैभव को नष्ट होते देखना पड़ा।
रामचरित मानस के अनुसार ऐसे व्यक्ति जीते हुए भी मरे हुए के समान हैं
रावण कामी व्यक्ति था जिसका जिक्र कई कथाओं में मिलता है। इसने वेदवती से दुराचार करने का प्रयास किया था। रंभा नाम की अप्सारा के साथ भी रावण का व्यवहार अनुचित था। इसने देवी सीता का भी हरण किया था इसलिए अंगद ने रावण से कहा कि कामी व्यक्ति जीते जी मरे हुए के समान होता है क्योंकि काम भाव की पूर्ति जितनी होती जाती है व्यक्ति की लालसा उतनी ही बढ़ती जाती है और मनुष्य अपनी मर्यादा भूल जाता है और विनाश की ओर जाता है।
रामचरित मानस के अनुसार ऐसे व्यक्ति जीते हुए भी मरे हुए के समान हैं
रावण अपने अहंकार में नकारात्मक विचारों वाला हो गया था उसे सच्चाई सामने दिख नहीं रही थी इसलिए वह भगवान राम की शक्ति को समझ ही नहीं पाया और वह अपनी उलटी सोच के कारण अपने विनाश की ओर बढ़ता रहा। इसलिए अंगद ने कहा था कि जिसकी सोच विपरीत हो जाए वह सांस लेता हुआ भी मरे हुए के समान है।
रामचरित मानस के अनुसार ऐसे व्यक्ति जीते हुए भी मरे हुए के समान हैं
रावण ने विभिषण को इसलिए दुत्कारा था क्योंकि रावण ने विभिषण को कमजोर और गरीब समझा था। विभिषण का अपमान ही रावण के अंत का कारण बना। अंगद ने रावण को पहले ही समझा दिया था कि गरीब का अपमान करने वाला मरे हुए के समान होता है इसलिए किसी को गरीब जानकर उसका अनादर नहीं करना चहिए।
रामचरित मानस के अनुसार ऐसे व्यक्ति जीते हुए भी मरे हुए के समान हैं
अंगद ने बालि को बताया था कि राम भगवान विष्णु के अंश हैं और जो व्यक्ति भगवान से वैर भाव रखता है और खुद को भगवान मान बैठता है उसका विनाश भी तय है, ऐसे व्यक्ति को मरा हुआ मानना चाहिए। रावण ने भगवान राम को अपना दुश्मन मान लिया था और खुद को अजेय अमर समझ बैठा था परिणाम विनाश हुआ।