भाद्र मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को श्री कृष्ण की प्राणप्रिया राधाजी का जन्मोत्सव मनाया जाता है। इस वर्ष कृष्ण प्रियतम का यह शुभ दिन 6 सितंबर को है। ब्रह्म वैवर्त पुराण के अनुसार राधाजी भी श्री कृष्ण की तरह ही अनादि और अजन्मी हैं।
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वे बृज में वृषभानु वैश्य की कन्या थी। उनका जन्म माता के गर्भ से नहीं हुआ बल्कि माता कीर्ति ने अपने गर्भ में 'वायु' को धारण कर रखा था और योगमाया की प्रेरणा से कीर्ति ने वायु को जन्म दिया। वायु के जन्म के साथ ही वहां राधा कन्या के रूप में प्रकट हो गईं। इस कारण श्री राधा रानी को देवी अयोनिजा भी कहा जाता है । जब वह बारह वर्ष की हो गयी तो उनके माता-पिता ने 'रायाण' वैश्य के साथ उनका विवाह तय कर दिया था।
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उस समय श्री राधा घर में अपनी छाया को स्थापित करके स्वयं अंतर्धयान हो गईं।उस छाया के साथ ही उक्त 'रायाण' का विवाह हुआ । शास्त्रों के अनुसार ब्रह्माजी ने पुण्यमय वृन्दावन में श्री कृष्ण के साथ साक्षात राधा का विधिपूर्वक विवाह संपन्न कराया था । कृष्ण भी पूजते हैं राधा को कथाओं में हर जगह कृष्ण के साथ राधा का ज़िक्र होता है। माना जाता है की राधा के बिना कृष्ण अधूरे है। धार्मिक पुराणों के अनुसार राधा और कृष्ण की पूजा का ही विधान है।
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