Pitru Paksha 2025 Date: पितृ पक्ष हिंदू धर्म में एक विशेष समय होता है, जब हम अपने पितरों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं और उनकी आत्मा की शांति के लिए अनुष्ठान करते हैं। यह समय हर साल भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा से शुरू होकर, आश्विन मास की अमावस्या तक चलता है। इस दौरान परिवार के सदस्य अपने पूर्वजों के लिए तर्पण, पिंडदान और अन्य धार्मिक क्रियाएं करते हैं। इसके साथ ही ब्राह्मणों को भोजन कराकर और उन्हें दान देने का रिवाज है, ताकि पितरों की आत्मा को शांति मिल सके।
Pitru Paksha 2025: 7 या 8 सितंबर कब है पितृ पक्ष? जानें इस दौरान क्या करें और क्या न करें
Shraddh Ka Mahatv: पितृ पक्ष के दौरान कुछ कार्यों से बचना भी जरूरी है, क्योंकि इन कार्यों को करने से पितर नाराज हो सकते हैं। इस बार पितृ पक्ष की शुरुआत कब से होगी, आइए जानते हैं विस्तार से।
पितृ पक्ष में क्या करें
- जिस दिन आपके पूर्वज का निधन हुआ था, उस दिन उनका श्राद्ध जरूर करना चाहिए।
- पितरों को तर्पण देना, जिसमें काले तिल, जौ और जल का अर्घ्य दिया जाता है, यह हर दिन करना चाहिए।
- श्राद्ध के दिन ब्राह्मणों को भोजन कराना महत्वपूर्ण है। अगर ब्राह्मण उपलब्ध न हों, तो आप किसी जरूरतमंद व्यक्ति या गाय को भोजन करा सकते हैं।
- पितृ पक्ष में दान का बहुत महत्व है। अन्न, वस्त्र, जूते, और अन्य जरूरी चीजों का दान करके आप पितरों की आत्मा को शांति दे सकते हैं।
- घर में पवित्रता और सात्विकता बनाए रखें, साफ-सफाई पर ध्यान दें।
पितृ पक्ष में क्या न करें
- मांस, शराब, या तामसिक भोजन का सेवन इस दौरान बिल्कुल नहीं करना चाहिए।
- पितृ पक्ष के दौरान विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन, या किसी नए व्यवसाय की शुरुआत न करें।
- इस अवधि में बाल या नाखून काटने की परंपरा नहीं है।
- नए कपड़े, गहने या कोई अन्य नई चीज खरीदने से बचें।
- खाने में लहसुन और प्याज का उपयोग न करें।
- घर में शांति बनी रहे, किसी से भी बहस या झगड़ा करने से बचें।
पितृपक्ष का महत्व
पितृ पक्ष पूर्वजों की आत्मा को शांति और मोक्ष दिलाने वाले दिन माने जाते हैं। हिंदू मान्यताओं की मानें तो पितरों की आत्माएं पितृलोक में रहती हैं। कहते हैं पितृ पक्ष के दौरान पितृ धरती पर आते हैं, जहां परिवार के लोग इनके लिए तर्पण और श्राद्ध कर्म करते हैं। श्राद्ध कर्म से पितृ दोष का भी निवारण होता है।
श्राद्ध और तर्पण की प्रक्रिया क्या है?
तर्पण में जल, तिल और कुशा का उपयोग कर पितरों को जल अर्पित किया जाता है। यह अनुष्ठान पवित्र नदियों जैसे गंगा, यमुना के तट या घर पर किया जा सकता है। श्राद्ध या पिंडदान में चावल, जौ और तिल से बने पिंड पितरों को समर्पित किए जाते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गया और वाराणसी जैसे तीर्थ स्थानों पर पिंडदान करना शुभ माना जाता है। इसके साथ ही ब्राह्मणों को सात्विक भोजन खिलाएं और सम्भव हो तो सामर्थ्यानुसार उन्हें दक्षिणा, वस्त्र और अन्य सामग्री का दान करें।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।