पं. निश्चल शास्त्री
जैनैटिक साइंस पर शोधकर्ताओं के अनुसार, आज भी हम अपने पूर्वजों से जुड़े हुए हैं। पितरों के डीएनए का विस्तार ही हमारा अस्तित्व है। प्रत्येक शिशु का जुड़ाव उसके पूर्वजों से बना रहता है। क्रोमोसोम्स के माध्यम से वैज्ञानिकों ने प्रमाणित किया है कि नवजात शिशु में कुछ गुण दादा एवं परदादा के और कुछ गुण नानामह तथा नाना के समाहित रहते हैं। पितरों के निमित्त श्राद्ध आदि कर्म करने से पितरों के साथ-साथ स्वयं का भी कल्याण होता है। पितरों का श्राद्ध करने से सकारात्मक वातावरण उत्पन्न होता है और घर की नकारात्मकता दूर होती है।
Pitru Paksha 2023: इन नियमों को ध्यान में रखकर करें श्राद्ध-कर्म, पितर होंगे प्रसन्न
Pitru Paksha 2023: श्राद्ध करने से प्रसन्न होते हैं पूर्वज, घर की नकारात्मकता भी होती है दूर
Pitru Paksha 2023: शोधकर्ताओं के अनुसार, पितरों के डीएनए का विस्तार ही हमारा अस्तित्व है। प्रत्येक शिशु का जुड़ाव उसके पूर्वजों से ही बना रहता है।
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धर्मशास्त्रों के अनुसार हमें जो शरीर दिखाई देता है, उसे स्थूल शरीर कहा जाता है और जो शरीर अदृश्य है, वह सूक्ष्म शरीर कहलाता है। स्थूल शरीर पंचतत्व, अग्नि, पृथ्वी, वायु, जल, आकाश से निर्मित है। आत्मा के साथ पंचतत्व एक-दूसरे में अंतर्निहित होकर मानव पिंड की रचना करते हैं। जब आत्मा भौतिक स्थूल शरीर से निकल जाती है तो पंचतत्व का अपना कोई पृथक अस्तित्व नहीं रहता है। कहा जाता है, एक बार पांचों तत्व- अग्नि, पृथ्वी, वायु, जल, आकाश के बीच वाद-विवाद होने लगा। वायु ने कहा कि मनुष्य मेरे कारण ही जीवित रहता है, मेरे जाते ही क्षण भर में उसकी जीवन-लीला समाप्त हो जाती है। यह सुनकर पृथ्वी तत्व बोला, मेरे कारण ही शरीर अस्तित्व में है, मेरे न होने पर मानव का अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है।
इस पर जल तत्व ने कहा, जीवन का आधार तो जल ही है। अग्नि तत्व ने अपना पक्ष रखते हुए कहा, मैं न रहूं तो यह शरीर क्षण भर में ठंडा हो जाए। आकाश तत्व ने कहा, मेरी उपयोगिता का मूल्यांकन तुम सबकी पहुंच से परे है, समस्त सूक्ष्म शक्तियों का संचालन मैं ही तो करता हूं। पांचों तत्वों का संवाद आत्मा बैठी-बैठी सुन रही थी। आत्मा ने शरीर से जैसे ही पलायन किया, पांचों तत्वों से बना शरीर बिखर गया। पंचतत्व समझ गए कि मानव शरीर में आत्मा ही प्रधान है। मरणोपरांत आत्मा का अस्तित्व यथावत बना रहता है। पितृ आत्माओं के प्रति श्रद्धांजलि और कृतज्ञता व्यक्त करने का पितृ पक्ष महापर्व है।
धर्मशास्त्र के अनुसार, माता-पिता का आशीर्वाद संतान के साथ हमेशा रहता है। जीवित माता-पिता संतान को प्रत्यक्ष आशीर्वाद देते हैं और दिवंगत आत्माएं पितरों के रूप में तीन पीढ़ियों तक अपनी संतानों का अप्रत्यक्ष मार्गदर्शन तथा सहायता करती हैं। पितृ पक्ष में संतान जब अपने पूर्वजों को याद कर श्राद्ध, तर्पण आदि से संतुष्ट करते हैं तो पूर्वजों की कृपा बरसती है। प्रसन्न होने पर पितृगण अपने वंशजों को विभिन्न बाधाओं से बचाते हैं।
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धर्म शास्त्रों में कहा गया है कि मनुष्य के सारे जप-तप, पूजा-पाठ, अनुष्ठान और मंत्र साधना आदि तभी सफल होते हैं, जब उसके पितृगण प्रसन्न होते हैं। पितरों के प्रसन्न होने पर ही सारे देवता प्रसन्न होते हैं। पितृगण के अतृप्त होने पर जीवन में अनेक प्रकार की बाधाएं आती हैं। श्राद्ध से तर्पित हुए पितृ अपने वंशजों को आशीर्वाद देते हैं। पितरों की कृपा से सब प्रकार की समृद्धि और सौभाग्य की प्राप्ति होती है।