Janmashtami 2022: भगवान कृष्ण को अपने बाल रूप में बांसुरी बजाने का बहुत शौक था। यह शौक ऐसा था कि उन्होंने 11 वर्ष 56 दिन की अवस्था (जिस दिन वह कंस वध के लिए मथुरा प्रस्थान किए) तक उन्होंने एक पल के लिए भी इस बांसुरी को अपने से अलग नहीं किया। हालांकि यह शौक दुनिया को दिखाने के लिए था,सही मायने में यह बांसुरी तो भगवान को अपनी प्रियतमा राधा रानी को करीब लाने का एक माध्यम थी। राधा रानी भी इसकी धुनों को सुनते ही भगवान से मिलने के लिए कुंज गलियों में दौड़ पड़ती थी।
Janmashtami 2022: भगवान कृष्ण ने क्यों तोड़ दी थी अपनी प्रिय बांसुरी,जानिए क्या हुआ ?
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मथुरा जाते समय जब भगवान राधा रानी से मिले तो उन्होंने वृंदावन में आखिरी बार बांसुरी बजाई और राधा रानी से विदा लेने के बाद उन्होंने बांसुरी बजाना ही छोड़ दिया। इस विदाई के वक्त भगवान ने कहा था कि शायद अब उनकी मुलाकात ना हो,लेकिन राधा रानी ने आग्रह किया कि वह गोलोक धाम प्रस्थान से पूर्व मानव शरीर में एक बार पुन:उनसे मिलना चाहेंगी। भगवान भी उनके आग्रह को टाल नहीं सके। इसलिए उन्होंने भले ही राधा रानी के विरह में बांसुरी बजाना छोड़ दिया, लेकिन वह राधा रानी के दिलों के तार को जोड़ने वाली बांसुरी को नहीं छोड़ पाए।
लेकिन कालांतर में जब राधा रानी की आखिरी मुलाकात द्वारिका में भगवान से हुई,तो उन्होंने बताया कि धरती से प्रस्थान का समय आ गया है। हालांकि भगवान ने उन्हें रोकने का प्रयास किया। यहां तक कि भगवान के आग्रह पर राधा रानी कुछ दिनों तक देविका के रूप में द्वारिका प्रवास भी किया। लेकिन राधा रानी ने कहा कि गोलोक धाम भी कुछ कार्य शेष हैं और उन्हें पूरा करना जरूरी है। इस आग्रह को भगवान टाल नहीं सके। फिर राधा रानी के आग्रह पर भगवान ने आखिरी बार बांसुरी बजाई। लेकिन जैसे ही भगवान ने बांसुरी बजाना शुरू किया,राधा रानी इस नश्वर शरीर का त्याग कर गोलोक धाम प्रस्थान कर गई। भगवान भी उन्हें जाते देखकर बहुत दुखी हुए और उनके विरह को बर्दाश्त नहीं कर पाए। उन्होंने उसी पल बांसुरी को तोड़कर झाड़ियों में फेंक दिया।
बिना राधा रानी के नहीं बजाई बांसुरी
मथुरा आने के बाद भी भगवान अपनी बांसुरी को सदैव अपने पास ही रखते थे। बल्कि दूसरे शब्दों में कहें तो वह इसे कभी अपने से अलग नहीं करते थे। गुरुकुल में उनके सहपाठियों व गुरुकुल से वापस लौटने के बाद उनकी मां देवकी ने उनके पास बांसुरी देखकर कई बार उसे बजाने का आग्रह किया। देवकी ने तो यहां तक कहा कि उनकी रस माधुरी बांसुरी की खूब चर्चा सुनी है। एक बार इसकी धुन उन्हें भी सुना दो,लेकिन भगवान उनके आग्रह को भी टाल गए। यहां तक कि जब उद्धव ने इस बांसुरी को सामान्य वाद्ययंत्र कह दिया तो उन्होंने इसका महत्व और इसकी विशेषता बताते हुए बताया कि आखिर वह क्यों इसे नहीं बजाते। उन्होंने उद्धव को कहा कि क्यों बजाएं बांसुरी,किसके लिए बजाएं,आखिर जब राधा रानी ही नहीं तो बांसुरी की धुनों का मतलब ही क्या।
वृंदावन में भगवान के साथी थे बांसुरी और मोरपंख
वृंदावन में 11 वर्ष 56 दिन के प्रवास के दौरान भगवान कृष्ण ने कभी सिले वस्त्र नहीं पहने,कभी पैरों में पनही नहीं पहनी। लेकिन माथे पर मोर मुकुट और हाथों से बांसुरी को कभी अलग नहीं किया। भागवताचार्यों का मत है कि बांसुरी जहां प्रेम का प्रतीक है,वहीं मोर मुकुट काम त्याग का परिचायक है। इस प्रसंग की व्याख्या अलग अलग विद्वानों ने अपने अपने तरीके से किया है,लेकिन इन सभी विद्वानों में कोई दो राय नहीं है कि दो शरीर में धरती पर अवतरित हुए भगवान कृष्ण और राधा रानी एक ही हैं, केवल लीला के लिए दो शरीर में अवतरित हुए हैं। यह बांसुरी ही तो थी जो इन दो शरीरों के तार को आपस में जोड़ने का काम करती थी। कई विद्वानों ने यहां तक माना है कि यह बांसुरी भी गोलोक धाम से ही आई थी।