कबीर दास जी ने अपना पूरा जीवन लोगों की भलाई के लिए समर्पित कर दिया और मृत्यु के बाद भी हिंदू और मुस्लिम धर्म में व्याप्त कुरीतियों को खत्म करने का प्रयास किया। उन्होंने अपने जीवन काल में हिन्दू और मुस्लिम को एकता में पिरोने का काम किया। वे हिन्दू-मुस्लिम धर्मों में फैली कुरीतियों के सख्त विरोधी थे। जिसके कारण दोनों ही धर्म के कुछ कट्टरपंथी लोग इनसे शत्रुता भी रखते थे। इसको लेकर कबीर ने दोहों की रचना भी की।
महान कवि और समाज सुधारक थे संत कबीर, मृत्यु के बाद भी दिया एकता का संदेश
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कबीर दास जी ने अपने दोहो में दोनों ही धर्म पर कटाक्ष किया था। वे रूढ़िवादिता से सदैव मानवीय गुणों को सर्वोपरि मानते थे।
दुनिया बड़ी बावरी, पहार पूजन जाए।
घर की चक्की कोई न पूजे, जिसका पीसा खाए।
कांकर पाथर जोरि कै मस्जिद लई बनाय।
ता चढ़ि मुल्ला बांग दे क्या बहरा हुआ खुदाय।।
कबीर दास जी को लोग कबीर साहब, संत कबीर दास भी कहते हैं। कबीर दास जी के शिष्यों ने उनकी विचार धारा का प्रचार करने के लिए एक संप्रदाय का गठन किया जिसे कबीरपंथ नाम से जाना जाता है। देश भर में करीब एक करोड़ लोग इस संप्रदाय से जुड़े हुए हैं जो कबीर के बताए हुए मार्ग पर चलते हैं।
कबीर के जन्म स्थान के विषय में विद्वानों में मतभेद हैं। लेकिन ज्यादातर लोग इनका जन्म काशी में ही मानते हैं। कबीर के जन्म के विषय में भी कई किवदंतिया हैं कहते हैं कि ऋषि रामानंद के आशीर्वाद से इनका जन्म एक विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से हुआ था जो लोक-लाज के डर से इन्हें लहर तारा तालाब के किनारे फेंक गई थी जहां से इन्हें नीमा और नीरू नाम के जुलाहे ले आए और इनका पालन पोषण किया। तो वहीं कुछ लोगों का मानना है कि कबीर जन्म से ही मुस्लिम थे।
कबीर जी अपने पूरे जीवन में समाज की सेवा में ही लगे रहे और अपने अंत समय में भी लोगों में व्याप्त अंधविश्वास को खत्म करने का प्रयास किया। उस समय समाज में यह अंधविश्वास था कि मगहर में मरने वालों को नरक में जाना पड़ता है इस अंधविश्वास को दूर करने के लिए कबीर अपने जीवन के अंत समय में मगहर चले गए।