Ganesh Chaturthi 2022: भादो माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी का दिन गणेश जन्मोत्सव के रुप में मनाया जाता है। इस दिन लोग ढोल-नगाड़ों के साथ गणेश जी को अपने घर लाते हैं। दस दिनों तक चलने वाला ये उत्सव बड़े ही धूम-धाम से मनाया जाता है। दस दिनों तक घर या पंडालों में गणपति बप्पा की पूजा की जाती है और सुख-समृद्धि की प्रार्थना की जाती है। फिर धूमधाम से गणेश जी का विसर्जन किया जाता है। इस बार गणेश चतुर्थी 31 अगस्त को मनाई जाएगी। 31 अगस्त को गणपति स्थापना के 10 दिन बाद यानी 9 सितंबर को विसर्जन होगा। इस मौके पर आइए जानते हैं गणेश जी के जन्म की पूरी कथा के बारे में...
Ganesh Chaturthi 2022: कैसे हुआ था भगवान गणेश का जन्म? जानें उनके जन्म की रोचक कथा
गणेश जी के जन्म से जुड़ी कई कथाएं प्रचलित हैं। शिवपुराण के अनुसार, एक बार माता पार्वती की आज्ञा का पालन करने में नंदी से कोई त्रुटि हो गई, तो माता पार्वती ने सोचा कि कोई ऐसा होना चाहिए, जो केवल उनकी आज्ञा का पालन करें। उन्होंने अपने शरीर पर उबटन लगाई थी। अपने शरीर से इस उबटन को उतार कर उन्होंने एक बालक की आकृति बनाई और उसमें प्राण डाल दिए। इस प्रकार गौरी पुत्र गणेश का जन्म हुआ।
वहीं एक दिन जब माता पार्वती स्नान कर रही थीं तब उन्होंने आदेश दिया कि जब तक वे न कहें किसी को अंदर न आने दें। बालक बाहर पहरा देने लगा। इस दौरान शिव जी के गण वहां आए तो बालक ने किसी को भी अंदर नहीं जाने दिया। तब स्वयं भगवान शिव वहां पहुंचें, लेकिन बालक ने उन्हें भी भीतर जाने से रोक दिया। जिससे शिव जी को क्रोध आ गया और उन्होंने बालक का सिर धड़ से अलग कर दिया। वहीं जब माता पार्वती बाहर आईं और ये सब देखा तो अत्यन्त क्रोधित हो गईं।
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बालक गणेश का कटा हुआ सिर देखकर माता पार्वती ने शिवजी से कहा कि आपने मेरे बेटे का सिर काट दिया, इसे जीवित कीजिए। शिवजी ने पूछा कि ये तुम्हारा बेटा कैसे हो सकता है? इसके बाद पार्वती ने शिवजी को पूरी कथा बताई। शिवजी ने पार्वती को मनाते हुए कहा कि ठीक है मैं इसमें प्राण डाल देता हूं, लेकिन प्राण डालने के लिए एक सिर चाहिए।
इस पर उन्होंने गरूड़ जी को आदेश दिया कि उत्तर दिशा में जाओ और वहां जो भी मां अपने बच्चे की तरफ पीठ कर के सोई हो उस बच्चे का सिर ले आना। गरूड़ जी भटकते रहे पर उन्हें ऐसी कोई मां नहीं मिली जो अपने बच्चे की तरफ पीठ करके सोई हो, क्योंकि हर मां अपने बच्चे की तरफ मुंह कर के सोती है। अंत में एक हथिनी दिखाई दी। हथिनी का शरीर का प्रकार ऐसा होता हैं कि वह बच्चे की तरफ मुंह करके नहीं सो सकती है। गरूड़ जी उस शिशु हाथी का सिर ले आए। इसके बाद शिव जी ने बालक के शरीर से शिशु हाथी का सिर जोड़ दिया। साथ ही उसमें प्राणों का संचार कर दिया। उनका नामकरण कर दिया। इस तरह श्री गणेश को हाथी का सिर लगा।