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शनि प्रदोष: शनि की अशुभ छाया से छुटकारा दिलाते हैं भगवान शिव, जानिए क्या है कथा

Sat, 30 Dec 2017 08:38 AM IST
टीम डिजिटल, अमर उजाला
टीम डिजिटल, अमर उजाला Updated Sat, 30 Dec 2017 08:38 AM IST
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shani pradosh 2017 importance and puja vidhi

30 दिसंबर को शनि प्रदोष है। बिगड़े हुए शनि को मानने के लिए शनि प्रदोष काफी फलदायी माना जाता है साथ ही व्रत भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है। प्रदोष व्रत हर महीने में दो होते हैं एक शुक्ल पक्ष में और एक कृष्ण पक्ष में। यह व्रत त्रयोदशी तिथि के दिन रखा जाता है। सोमवार के दिन त्रयोदशी तिथि पड़ने पर इसे सोम प्रदोष व्रत कहते हैं और मंगलवार के दिन पड़ने पर भौम प्रदोष व्रत कहा जाता है। इन दोनों प्रदोष व्रतों के अलावा शनिवार के दिन पड़ने वाले प्रदोष व्रत का भी बड़ा महत्व है। शनिवार के दिन जब त्रयोदशी तिथि पड़ती है तब इसे शनि प्रदोष व्रत के नाम से जाना जाता है।

shani pradosh 2017 importance and puja vidhi
shani dev

ज्योतिषशास्त्र के अनुसार शनिप्रदोष व्रत शनि के अशुभ प्रभाव से बचाव के लिए उत्तम होता है। शनि प्रदोष व्रत करने वाले पर शनिदेव की असीम कृपा होती है। व्रत करने वाले को इस दिन प्रातः काल भगवान शिव की पूजा करनी चाहिए इसके बाद शनि देव की पूजा। संध्या काल में सूर्यास्त के बाद रात होने से पहले गोधूली के समय शिव और शनि की पूजा करने से व्रत पूरा होता है। शनि प्रदोष व्रत के दिन ग्यारह बार दशरथकृत शनि स्तोत्र का पाठ करने से शनि के अशुभ प्रभाव के कारण जीवन में आ रही परेशानी में कमी आती है।

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शनि प्रदोष व्रत की कथा है कि प्राचीन काल में एक नगर सेठ थे। सेठ जी के घर में सभी सुख-सुविधाएं थीं लेकिन संतान नहीं होने के कारण सेठ और सेठानी दुःखी थे। काफी सोच-विचार करके सेठ जी ने अपना काम नौकरों को सौंप दिया और खुद सेठानी के साथ तीर्थयात्रा पर निकल पड़े। अपने नगर से बाहर निकलने पर उन्हें एक साधु मिले जो ध्यानमग्न थे। सेठ जी ने सोचा कि क्यों न साधु से आशीर्वाद लेकर आगे की यात्रा की जाए।

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सेठ और सेठानी साधु के निकट बैठ गये। साधु ने जब आंखें खोली तो उन्हें ज्ञात हुआ कि सेठ और सेठानी काफी समय से आशीर्वाद की प्रतीक्षा में बैठे हैं। साधु ने सेठ और सेठानी से कहा कि मैं तुम्हारा दुःख जानते हूं। तुम शनि प्रदोष व्रत करो इससे संतान सुख प्राप्त होगा। साधु ने प्रदोष व्रत की विधि भी बताई।

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शनि-सिग्नापुर
सेठ और सेठानी साधु से आशीर्वाद लेकर तीर्थयात्रा के लिए आगे चल पड़े। तीर्थ यात्रा से लौटने के बाद सेठ और सेठानी ने मिलकर शनि प्रदोष व्रत किया। व्रत के प्रभाव से कुछ समय बाद सेठानी गर्भवती हुई और सेठ जी के घर पुत्र का जन्म हुआ।
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