Makar Sankranti 2026: मकर संक्रांति सनातन संस्कृति का एक अत्यंत पावन और शुभ पर्व है, जो प्रकृति, सूर्य उपासना और मानव जीवन के बीच संतुलन को प्रदर्शित करता है। यह त्यौहार भारत के विभिन्न प्रदेशों में भिन्न-भिन्न नामों से मनाया जाता है। उत्तर भारत में इसे मकर संक्रांति, गुजरात और महाराष्ट्र में उत्तरायण, तमिलनाडु में पोंगल तथा असम में माघ बिहू के नाम से जाना जाता है। नाम चाहे अलग हों, लेकिन इस पर्व का मूल भाव एक ही है, और वह है; सूर्य देव की उपासना और दान-पुण्य करना।
मकर संक्रांति का पर्व सूर्य देव के मकर राशि में प्रवेश के साथ ही मनाया जाता है। यह वह क्षण होता है, जब सूर्य उत्तरायण होते हैं और खरमास के बाद शुभ काल आरंभ होता है। धार्मिक दृष्टि से यह समय आत्मशुद्धि और पुण्य अर्जन के लिए अत्यंत श्रेष्ठ माना गया है। सामान्यत: भारतीय पंचांग पद्धति की समस्त तिथियां चन्द्रमा की गति को आधार मानकर निर्धारित की जाती हैं, किन्तु मकर संक्रान्ति को सूर्य की गति से निर्धारित किया जाता है।
Magh Mela 2026: मकर संक्रांति पर क्या है स्नान का शुभ मुहूर्त? जानें इस पवित्र डुबकी का महत्व
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देवताओं के दिन की गणना
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देवताओं के दिन की गणना
शास्त्रों के अनुसार, देवताओं के दिन की गणना इस दिन से ही प्रारम्भ होती है, सूर्य जब दक्षिणायन में रहते हैं तो उस अवधि को देवताओं की रात्रि व उत्तरायण के छ: माह को दिन कहा जाता है। सामान्यतः सूर्य सभी राशियों को प्रभावित करते हैं, किन्तु कर्क व मकर राशियों में सूर्य का प्रवेश अत्यन्त महत्वपूर्ण है। यह प्रवेश अथवा संक्रमण क्रिया छह-छह माह के अन्तराल पर होती है।सर्वविदित है कि पृथ्वी की धुरी 23.5 अंश झुकी होने के कारण भगवान सूर्य छह माह पृथ्वी के उत्तरी गोलार्द्ध के निकट होते हैं और शेष छह माह दक्षिणी गोलार्द्ध के निकट होते हैं।
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मकर संक्रांति का वैज्ञानिक महत्व
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मकर संक्रांति का वैज्ञानिक महत्व
मकर संक्रांति का वैज्ञानिक कारण यह है कि इस दिन से सूर्य के उत्तरायण हो जाने से प्रकृति में बदलाव शुरू हो जाता है.शीत के कारण से ठिठुरते लोगों को भगवान सूर्य के उत्तरायण होने से शीत ऋतु से राहत मिलना आरंभ होता है। भारत देश उत्तरी गोलार्ध में स्थित है, इसलिए ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ का उद्घोष करने वाली भारतीय संस्कृति में मकर संक्रांति अत्यंत महत्वपूर्ण है।भारतवर्ष के लोग इस दिन सूर्यदेव की आराधना एवं पूजन कर, उनके प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करते हैं।
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मकर संक्रांति का पौराणिक कथा
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मकर संक्रांति का पौराणिक कथा
भारत एक कृषि प्रधान देश है, जहां के पर्व त्योहार का संबंध काफी कुछ कृषि पर निर्भर करता है। भारत के हर राज्य में मकर संक्रांति को जिस श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है, उससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि इस त्योहार से कुछ धार्मिक मान्यताएं जुड़ी हैं। इस त्योहार का उल्लेख हमारे कई धार्मिक ग्रंथों में मिलता है, जो इसके धार्मिक महत्व को उजागर करते हैं। भगवान कृष्ण की वाणी कही जाने वाली धार्मिक ग्रंथ "गीता" में वर्णित है कि उत्तरायण के छह महीने देवताओं के दिन का समय होते हैं और दक्षिणायन के छह महीने देवताओं की रात का समय होते हैं। ऐसा माना जाता है कि जो व्यक्ति उत्तरायण में अपने शरीर का बलिदान करता है (मृत्यु को प्राप्त होता है) उसे कृष्ण लोक में स्थान मिलता है और मोक्ष प्राप्त होता है, जबकि दक्षिणायन में मरने वाले को पुनर्जन्म लेना पड़ता है।
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मकर संक्रांति का पौराणिक कथा
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महाभारत काल में भीष्म पितामह को मृत्यु की इच्छा का वरदान प्राप्त था। बाणों से भरी शय्या पर लेटे होने के बावजूद उन्होंने दक्षिणायन में प्राण त्याग नहीं किए और सूर्य के उत्तरायण में प्रवेश करने की प्रतीक्षा की। ऐसा माना जाता है कि मकर संक्रांति के दिन जब भगवान सूर्य उत्तरायण में प्रवेश कर गये, तब भीष्म पितामह ने प्राण त्याग दिए। मकर संक्रांति के संदर्भ में एक और धार्मिक कथा प्रचलित है, जिसके अनुसार यशोदा माता ने भगवान कृष्ण को पुत्र के रूप में प्राप्त करने के लिए व्रत रखा था। गंगा अवतरण की कथा भी मकर संक्रांति से जुड़ी हुई है। ऐसा कहा जाता है कि मकर संक्रांति के दिन मां गंगा ने भागीरथ मुनि का अनुसरण किया और सागर से मिलीं। मां गंगा और सागर के इस मिलन के कारण ही मकर संक्रांति पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु गंगासागर में स्नान करने आते हैं।