Ganesh Chaturthi August 2020: गणेश चतुर्थी पर्व भाद्रपद मास में शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि के दिन आता है। यह पर्व गणपति महाराज का जन्मोत्सव है जिसे उनके भक्त बड़े ही धूमधाम के साथ मनाते हैं। इस साल यह पर्व 22 अगस्त शनिवार के दिन मनाया जाएगा। भगवान गणेश जी भगवान शिव और मां पार्वती के पुत्र हैं और वे सभी देवों में सर्वप्रथम पूजनीय हैं। गणेश जी का स्वरूप अन्य देवताओं की अपेक्षा भिन्न है। दरअसल, उनका धड़ (सिर से निचला भाग) तो मनुष्य का है परंतु सिर हाथी का है। इसी कारण उन्हें गजानन के नाम से भी संबोधित किया जाता है।
गणेश भगवान के सिर को भोलेनाथ ने ही काटा था और फिर बाद में उन्होंने ही उनके शरीर में हाथी का सिर जोड़ा था। कहते हैं जहां गणेश जी का सिर कटा था वह सिर आज भी एक गुफा में मौजूद है। पौराणिक कथा में वर्णन मिलता है कि भगवान शिव ने गुस्से में आकर गणेश जी का सिर काट दिया था, उसे उन्होंने एक गुफा में रख दिया था। इस को पालाल भुवनेश्वर के नाम से जाना जाता है।
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गणेश चतुर्थी के लिए तैयार की गई मूर्ति
- फोटो : अमर उजाला
यहां गणेश भगवान को आदि गणेश के नाम से जाना जाता है। मान्यता के अनुसार इस गुफा की खोज आदिशंकराचार्य ने की थी। ये गुफा उत्तराखंड के पिथौड़ागढ़ के गंगोलीहाट से 14 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। मान्यता के अनुसार, कहा जाता है कि गुफा में मौजूद गणेश भगवान के सिर की रक्षा खुद शिव भगवान करते हैं। यहां गणेश के कटे शिलारूपी मूर्ति के ठीक ऊपर 108 पंखुड़ियों वाला शवाष्टक दल ब्रह्मकमल के रूप की एक चट्टान है।
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गणेश चतुर्थी के अवसर पर परमातपुर मनसा माता मंदिर के पास स्थापित की गई विघ्नहर्ता की प्रतिमा।
यहा इंस ब्रह्मकमल से भगवाम गणेश के शिलारूपी मस्तक पर दिव्य बूंद टपकती है। मुख्य बूंद गणेश भगवान पर गिरती है। इस ब्रह्मकमल को स्वयं भगवान शिव ने ही यहां स्थापित किया था। इस गुफा में 33 हजार देवी देवताओं की मूर्तियां हैं। साथ ही यहां पर बहता हुआ पानी भी है।
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गणेश चतुर्थी की तैयारियां अंतिम दौर में
- फोटो : अमर उजाला
पौराणिक मान्यता के अनुसार, कहा जाता है कि एक दिन जब माता पार्वती स्नान कर रही थी तब उन्होंने आदेश दिया कि जब तक वे न कहें किसी को अंदर न आने दें। बालक बाहर पहरा देने लगा। जब शिव जी के गण वहां आए तो बालक ने किसी को भी अंदर नहीं जाने दिया। तब स्वयं भगवान शिव वहां पहुंचे लेकिन बालक ने उन्हें भी भीतर जाने से रोक दिया।