बाड़मेर राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 25 पर लूणी नदी के तट पर स्थित प्राचीन रणछोड़राय खेड़ मंदिर न केवल श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है, बल्कि यह पश्चिमी राजस्थान की समृद्ध ऐतिहासिक धरोहर और स्थापत्य कला का अद्भुत उदाहरण भी माना जाता है। लगभग 8-9 किलोमीटर दूर बालोतरा से स्थित यह मंदिर ‘मारवाड़ का तीर्थराज’ और ‘पश्चिमी राजस्थान का द्वारिकाधीश’ के नाम से भी प्रसिद्ध है।
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रणछोड़राय खेड़ मंदिर की अनोखी पहचान
- फोटो : अमर उजाला
ऐतिहासिक महत्व
इतिहासकारों के अनुसार, खेड़ का प्राचीन नाम ‘खेड़ पट्टन’ और ‘क्षीरपुर’ था। विक्रम संवत 685 से 1056 तक यहां कई राजपूत वंशों का शासन रहा। बाद में गुहिल राजपूतों ने इसे राजधानी बनाया। विक्रम संवत 813 में अरब आक्रमण हुआ और 1253 में दिल्ली सल्तनत के सुल्तान कुतुबुद्दीन ने मंदिर पर हमला कर कई प्रतिमाएं खंडित कर दीं। 13वीं शताब्दी में राठौड़ वंश के संस्थापक राव सिहाजी और उनके पुत्र अस्थानजी ने गुहिलों को हराकर खेड़ पर अधिकार किया और यहां राठौड़ों का शासन स्थापित हुआ।
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रणछोड़राय खेड़ मंदिर बना श्रद्धालुओं और पर्यटकों का आकर्षण केंद्र
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मंदिर की भव्यता
मंदिर में भगवान श्री रणछोड़राय (भगवान विष्णु का रूप) की सफेद संगमरमर से बनी भव्य प्रतिमा स्थापित है। मंदिर परिसर में भगवान विष्णु के साथ-साथ ब्रह्माजी, लक्ष्मीजी, अन्नपूर्णा देवी, महिषासुर मर्दिनी, नीलकंठ महादेव और हनुमानजी के मंदिर भी हैं। विशाल तोरणद्वार, बारीक नक्काशी और आसपास बिखरे प्राचीन सभ्यता के अवशेष इस धरोहर की ऐतिहासिकता को और गहराई देते हैं। धार्मिक दृष्टि से खेड़ मंदिर का महत्व बहुत बड़ा है। राधा अष्टमी, कृष्ण जन्माष्टमी, कार्तिक पूर्णिमा और गुरु पूर्णिमा यहां बड़े धूमधाम से मनाए जाते हैं। खासकर अन्नकूट महोत्सव पर जोधपुर संभाग का सबसे बड़ा मेला लगता है। श्रद्धालुओं के ठहरने और भोजन की निःशुल्क व्यवस्था मंदिर ट्रस्ट द्वारा की जाती है।
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रणछोड़राय खेड़ मंदिर में लाखों दीपों से जगमगाता दीपोत्सव
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दीपोत्सव की भव्यता
खेड़ रणछोड़राय मंदिर प्रदेश में दीपोत्सव आयोजन के लिए भी विशेष पहचान रखता है। अयोध्या के बाद इसे सबसे बड़ा दीपोत्सव माना जाता है। लाखों दीपों की रोशनी से मंदिर परिसर जगमगा उठता है। महिलाओं और बालिकाओं द्वारा बनाई गई रंग-बिरंगी कलात्मक रंगोलियां और पौराणिक कथाओं की जीवंत झांकियां भक्तों और पर्यटकों को मंत्रमुग्ध कर देती हैं। कुछ वर्ष पहले तक मंदिर जीर्ण-शीर्ण अवस्था में था, लेकिन मंदिर ट्रस्ट और स्थानीय समुदाय के प्रयासों से इसका जीर्णोद्धार और आधुनिकीकरण किया गया। आज यह मंदिर अपनी भव्यता और धार्मिक महत्त्व के साथ श्रद्धालुओं और पर्यटकों का स्वागत कर रहा है।