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Ujjain: बाबा महाकाल की नगरी में उमड़ेगा आस्था का सैलाब, 15 अप्रैल से शुरू होगी 118 किमी की पंचकोशी यात्रा

Wed, 12 Apr 2023 01:05 PM IST
अंकिता विश्वकर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, उज्जैन
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, उज्जैन Published by: अंकिता विश्वकर्मा Updated Wed, 12 Apr 2023 01:05 PM IST
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118 km Panchkoshi Yatra will start from April 15 in the city of Baba Mahakal
15 अप्रैल से शुरू होगी पंचकोशी यात्रा - फोटो : अमर उजाला
धार्मिक और पौराणिक नगरी उज्जैन में द्वादश ज्योर्तिलिंगों में से एक बाबा महाकाल विराजित हैं। बाबा महाकाल, महाकाल वन के मध्य में विराजित हैं, जिनके चारों और चारों दिशाओं में चार द्वारपाल भी शिवलिंग के रूप में विराजित हैं। कहा जाता है कि जो भी महाकाल वन में भ्रमण के साथ इनकी भक्ति करता है उसे न केवल महाकाल की कृपा प्राप्त होती हैं। बल्कि व्यक्ति स्वास्थ्य, यौवन, धन, ऐश्वर्य और चिरकालिक परमानंद को भी प्राप्त करता हैं। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर उज्जैन में प्रतिवर्ष अनादिकाल से पंचक्रोसी या पंचकोशी यात्रा की जाती है। 


स्कंदपुराण में है जिक्र
पंचकोशी यात्रा का वर्णन स्कंदपुराण में भी हैं। जिसमें कहा गया हैं, कि काशी में जीवनभर रहनें से जितना पुण्य अर्जित होता हैं, उतना पुण्य वैशाख मास में मात्र पांच दिन महाकाल वन में प्रवास करने पर ही मिल जाता हैं। इस यात्रा को पंचकोशी इसलिए कहा जाता हैं, क्योंकि यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं को प्रत्येक पांच कोस पर विश्राम करना पड़ता हैं।

एक कोस चार किलोमीटर के बराबर माना जाता हैं, इस हिसाब से श्रद्धालुओं को 20 किलोमीटर रोज चलकर आराम करना होता हैं। किंतु शहरी विस्तार एवं उज्जैन के आसपास बढ़ती आबादी ने इस यात्रा को 118 किमी के करीब कर दिया हैं। 
 
118 km Panchkoshi Yatra will start from April 15 in the city of Baba Mahakal
तपसी धूप में 118 किमी की यात्रा करते हैं श्रद्धालु - फोटो : अमर उजाला
15 अप्रैल से शुरू होगी पंचकोशी यात्रा
यह यात्रा प्रतिवर्ष की तरह इस वर्ष भी वैशाख कृष्ण पक्ष की दशमी यानी 15 अप्रैल 2023 शनिवार से शुरू होकर वैशाख अमावस्या 20 अप्रैल 2023 को समाप्त होगी। यात्रा पटनी बाजार उज्जैन स्थित नागचन्द्रेश्वर भगवान के दर्शन कर आरंभ की जाती हैं। यहाँ श्रद्धालु भगवान नागचन्द्रेश्वर को नारियल अर्पित करते हैं। ऐसी मान्यता हैं,कि भगवान नागचन्द्रेश्वर के दर्शन से श्रद्धालुओं को बल की प्राप्ति होती हैं। जिससे यात्रा सुगमता पूर्वक संपन्न होने में मदद मिलती हैं। एक अन्य मान्यता यह भी प्रचलित हैं, कि महाकाल वन में यात्रा के दौरान सांप तथा अन्य विषैले जीव-जंतु श्रद्धालुओं को परेशान न करें इस कामना से भगवान नागचन्द्रेश्वर से प्रार्थना की जाती हैं। 

यात्रा के पड़ाव 
  • प्रथम पड़ाव पिंगलेश्वर - नागचन्द्रेश्वर से बल लेकर श्रद्धालु अपने पहले पड़ाव (विश्राम स्थल) पिंगलेश्वर महादेव की और निकल पड़ते हैं। नागचन्द्रेश्वर से पिंगलेश्वर की दूरी 12 किलोमीटर हैं। यहां रूककर श्रद्धालु पिंगलेश्वर महादेव के दर्शन करते हैं। पिंगलेश्वर महादेव के दर्शन करने से धर्म और धन की प्राप्ति होती हैं। 
     
  • दूसरा पड़ाव करोहन - पिंगलेश्वर से वैशाख कृष्ण एकादशी को निकलकर श्रद्धालु शनि मंदिर त्रिवेणी पहुंचते हैं, कुछ देर विश्राम और मोक्षदायी क्षिप्रा नदी में स्नान कर शनिदेव के दर्शन करते हैं और यहां तेल अर्पित करते हैं। यहाँ से निकलकर राघो पिपलिया पहुंचते हैं, जहां ग्रामीणों और सामाजिक संस्थाओं द्धारा भंडारों और स्वल्पाहार से यात्रियों का स्वागत किया जाता हैं। रास्ते में अनेक लोग शिव, पार्वती, कृष्ण का स्वांग धरकर यात्रा करने वाले श्रद्धालुगण मिलते हैं, जो रास्तेभर लोगों का उत्साहवर्धन करते रहते हैं। पिंगलेश्वर से करोहन की दूरी 23 किमी पड़ती है।
     
  • दुर्देश्वर पड़ाव (जैथल) से उंड़ासा उप पड़ाव - जैथल से उंड़ासा उप पड़ाव की दूरी 16 किमी हैं, जहां यात्रीगण कुछ सुस्ता कर पुन: अपनी यात्रा जारी करते हैं। 
     
  • उंड़ासा उप पड़ाव से रेती मैदान - उंड़ासा उप पड़ाव से क्षिप्रा रेती घाट की दूरी 12 किमी हैं। पंचकोशी यात्रियों का यह आखिरी मुकाम है। जहां यात्री क्षिप्रा में स्नान करते हैं और भगवान नागचन्द्रेश्वर से यात्रा की शुरूआत में लिये गए बल(ताकत) को वापस करते हैं। इसके लिए यात्री नागचन्द्रेश्वर को प्रतीक स्वरूप मिट्टी के घोड़े अर्पित करते हैं। उज्जैन शहर में प्रवेश करने से पूर्व शहर की अनेक संस्थाओं द्वारा यात्रियों का भव्य स्वागत किया जाता हैं। जिनमें मंगल तिलक लगाना, बैंड बाजों से स्वागत, फूलमालाओं से स्वागत और स्वल्पाहार के साथ स्वागत शामिल है।
118 km Panchkoshi Yatra will start from April 15 in the city of Baba Mahakal
नागचंद्रेश्वर मंदिर से शुरू होती है पंचकोशी यात्रा - फोटो : अमर उजाला
यात्री करते हैं अष्टतीर्थ यात्रा
कुछ यात्री पंचकोशी यात्रा के बाद अष्ट तीर्थ यात्रा पर निकल पड़ते हैं, जो कर्कराज मंदिर से प्रारंभ होकर केदारेश्वर, रणजीत हनुमान, कालभैरव, सिद्धनाथ, कालियादेह, मंगलनाथ होते हुए महाकाल मंदिर पर समाप्त हो जाती हैं।

वैशाख की तपती दोपहर में आस्था की डगर
वैशाख की तपती दोपहर में हजारों श्रद्धालु आस्था की डगर पर यात्रा करते हैं। यात्रा के कुछ पड़ाव क्षिप्रा के किनारे हैं।  पंचकोशी यात्रा पर जाने वाले श्रद्धालु यात्रा शुरू होने के एक दिन पहले नगर में आकर मोक्षदायिनी क्षिप्रा के रामघाट पर विश्राम करते हैं। सुबह क्षिप्रा स्नान कर पटनी बाजार स्थित नागचंद्रेश्वर मंदिर पहुंच भगवान नागचंद्रेश्वर को श्रीफल अर्पित कर बल प्राप्त करते हैं। इसके बाद यात्रा की शुरुआत होती है। पंचक्रोशी यात्रा में पिंगलेश्वर, करोहन, नलवा, बिलकेश्वर, कालियादेह महल, दुर्देश्वर और उंड़ासा समेत कुल पांच पड़ाव और दो उपपड़ाव आते हैं। नगर प्रवेश के बाद रात्रि में यात्री नगर सीमा स्थित अष्टतीर्थ की यात्रा कर तड़के क्षिप्रा स्नान करते हैं।
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