धार्मिक नगरी उज्जैन में मां गढ़कालिका का मंदिर अत्यंत प्राचीन है। ऐसा माना जाता है कि इसकी स्थापना महाभारत काल में हुई थी, जबकि मां की मूर्ति सतयुग काल की बताई जाती है। मंदिर का जीर्णोद्धार ईस्वी संवत 606 में सम्राट हर्षवर्धन ने करवाया था। स्टेट काल में ग्वालियर के महाराजा ने इसका पुनर्निर्माण कराया। पुराने शहर के गढ़क्षेत्र में प्राचीन भैरव पर्वत पर माता गढ़कालिका विराजित हैं। दक्षिण भारतीय परंपरा में इसे शक्तिपीठ या देवी पीठ माना गया है।
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महाभारत काल में हुई थी मंदिर की स्थापना
- फोटो : अमर उजाला
गर्भगृह में माता कालिका की मूर्ति मुखाकृति में विराजित है, जो भयानक रूप वाली लेकिन हंसती हुई दिखाई देती हैं। मूर्ति के आसपास माता महालक्ष्मी और माता सरस्वती भी विराजित हैं। मंदिर की शासकीय पुजारी महंत करिश्मा नाथ के अनुसार माता गढ़कालिका संहारकारिणी शक्ति स्वरूप हैं और ललाट पर हिंगलू से बना गोलाकार रक्ताभ टीका, विशाल नेत्र और लपलपाती जिह्वा उन्हें अत्यंत दर्शनीय बनाते हैं। महाकवि कालिदास भी मां गढ़कालिका के उपासक माने जाते हैं।
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आज भी चढ़ते हैं कपड़े से बने नरमुंड
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माना जाता है कि आज भी मंदिर में कपड़े के बने नरमुंड चढ़ाए जाते हैं और दशहरे के दिन नींबू का प्रसाद वितरित किया जाता है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि घर में ये नींबू रखने से सुख-शांति बनी रहती है। नवरात्रि में माता के दर्शन मात्र से अपार सफलता और समृद्धि प्राप्त होती है। मंदिर तांत्रिक क्रियाओं के लिए भी प्रसिद्ध है और इस दौरान माता भक्तों को अलग-अलग रूपों में दर्शन देती हैं।
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दशहरे पर बंटता है नींबू का प्रसाद
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महाकवि कालिदास से जुड़ी मान्यता के अनुसार एक बार पेड़ की डाल काटने पर उनकी पत्नी विद्योत्तमा ने उन्हें फटकार लगाई। इसके बाद कालिदास ने मां गढ़कालिका की उपासना की और महान कवि बन गए। उज्जैन में हर साल होने वाले कालिदास समारोह के आयोजन से पहले माता कालिका की आराधना की जाती है।
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भैरव पर्वत पर विराजित हैं माता गढ़कालिका
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शक्ति संगम तंत्र में भी माता गढ़कालिका का उल्लेख है। मंदिर के आसपास के मार्ग नीचे होने के कारण यह स्पष्ट होता है कि मंदिर पर्वत पर स्थापित था। विभिन्न कालखंडों में मंदिर के जीर्णोद्धार के प्रमाण भी मिलते हैं। तांत्रिक क्रियाओं के लिए भी यह मंदिर मशहूर है। यहां पर पूर्व में बलि प्रथा भी थी लेकिन अब समय के साथ बलि प्रथा बंद हो गई है।