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Har Ghar Tiranga: देश में जबलपुर से शुरू हुआ था झंडा सत्याग्रह, टाउन हॉल में पहली बार 1922 में फहरा था तिरंगा
Mon, 15 Aug 2022 07:54 AM IST
अंकिता विश्वकर्मा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जबलपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जबलपुर
Published by: अंकिता विश्वकर्मा
Updated Mon, 15 Aug 2022 07:54 AM IST
सार
Har Ghar Tiranga: देश में जबलपुर से शुरू हुआ था झंडा सत्याग्रह, टाउन हॉल में पहली बार 1922 में फरहा था तिरंगा
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टाउन हॉल जिसे अब गांधी भवन के नाम से जाना जाता है।
- फोटो : सोशल मीडिया
हमारा राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा हमारी आन, बान और शान का प्रतीक है। ये देश की हर इमारत पर शान से लहरा सके और हम अपनी आजादी की जश्न मना सकें, इसके लिए हमारे पूर्वजों ने एक बड़ी कीमत चुकाई है। हमारी आने वाली पीढ़ियां भी आजाद भारत में सांस ले सकें इसके लिए देश की सरहद पर तैनात हर सेना का जवान हमारे तिरंगे की आबरू के लिए विषय परिस्थितियों में भी डटा है। हम जिस आजादी से आज हर घर तिरंगा अभियान में शामिल होकर तिरंगा झंडा लगा पा रहे हैं गुलामी के दौर में इसे फहराना एक गुनाह था। लेकिन आजादी के दीवानों ने उस गुनाह को किया और लंबी लड़ाई के बाद हमें तिरंगे को शान से फहराने का अधिकार देकर गए।
टाउन हॉल वर्तमान के गांधी भवन में स्थित महात्मा गांधी की प्रतिमा (फाइल फोटो)
- फोटो : सोशल मीडिया
संस्कारधानी से हुई थी झंडा सत्याग्रह शुरुआत
इतिहासकारों के मुताबिक देश में झंडा सत्याग्रह की शुरुआत जबलपुर से हुई थी। सत्याग्रह के तहत ही अक्टूबर 1922 में टाउन हॉल स्थित नगर पालिका (सरकारी) इमारत पर पहली बार तिरंगा फहराया गया था। बताया जाता है कि जब चौरी-चौरा कांड के बाद महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन वापस लिया तो कांग्रेस ने एक समिति का गठन किया, जिसके सदस्यों में शामिल पंडित मोतीलाल नेहरू, चक्रवती राजगोपालाचारी और विट्ठल भाई पटेल जबलपुर पहुंचे थे। जबलपुर के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने टाउन हॉल नगर पालिका भवन पर तिरंगा फहराकर उनका स्वागत किया था। गुलाम भारत में ये पहली बार था, जब किसी सरकारी इमारत में तिरंगा झंडा फहराया गया था। जब ये बात ब्रिटेन में हाउस ऑफ कामंस तक पहुंची तो शासकीय और अद्धशासकीय भवनों में तिरंगा फहराने पर प्रतिबंध लगा दिया गया।
अंग्रेजी हुकूमत के तिरंगे को फहराने पर लगी रोक को जबलपुर के स्वतंत्रता सेनानियों ने एक चुनौती की तरह स्वीकार किया और दोबारा टाउनहॉल में झंडा फहराने की निर्णय लिया गया। जब कांग्रेस की दूसरी समिति के सदस्य के रूप में पूर्व राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद, चक्रवती राजगोपालाचारी, देवदास गांधी, जमनालाल बजाज यहां पहुंचे तो नगर कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष तपस्वी सुंदरलाल ने अपने साथियों के साथ मिलकर तत्कालीन अंग्रेजी डिप्टी कलेक्टर हेमिल्टन से तिरंगा फहराने की अनुमति मांगी। लेकिन हेमिल्टन ने तिरंगे के साथ ही यूनियन जैक का भी झंडा फहराने की शर्त रखी। स्वतंत्रता सेनानियों ने इसे तिरंगे का अपमान माना और इस शर्त को अस्वीकार कर दिया। 18 मार्च 1923 को सुभद्रा कुमारी चौहान, माखनलाल चतुर्वेदी, पं. बालमुकुंद त्रिपाठी, तपस्वी सुंदरलाल टाउन हॉल पहुंचे और योजना बनाकर अंग्रेजों की आंखों में धूल झोंककर टाउन हॉल में दूसरी बार तिरंगा फहराया। इस गुश्ताखी के लिए अंग्रेजों ने कई स्वतंत्रता सेनानियों को गिरफ्तार कर जेल में भेजा और लाठीचार्ज किया गया।
इतिहासकारों के मुताबिक देश में झंडा सत्याग्रह की शुरुआत जबलपुर से हुई थी। सत्याग्रह के तहत ही अक्टूबर 1922 में टाउन हॉल स्थित नगर पालिका (सरकारी) इमारत पर पहली बार तिरंगा फहराया गया था। बताया जाता है कि जब चौरी-चौरा कांड के बाद महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन वापस लिया तो कांग्रेस ने एक समिति का गठन किया, जिसके सदस्यों में शामिल पंडित मोतीलाल नेहरू, चक्रवती राजगोपालाचारी और विट्ठल भाई पटेल जबलपुर पहुंचे थे। जबलपुर के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने टाउन हॉल नगर पालिका भवन पर तिरंगा फहराकर उनका स्वागत किया था। गुलाम भारत में ये पहली बार था, जब किसी सरकारी इमारत में तिरंगा झंडा फहराया गया था। जब ये बात ब्रिटेन में हाउस ऑफ कामंस तक पहुंची तो शासकीय और अद्धशासकीय भवनों में तिरंगा फहराने पर प्रतिबंध लगा दिया गया।
अंग्रेजी हुकूमत के तिरंगे को फहराने पर लगी रोक को जबलपुर के स्वतंत्रता सेनानियों ने एक चुनौती की तरह स्वीकार किया और दोबारा टाउनहॉल में झंडा फहराने की निर्णय लिया गया। जब कांग्रेस की दूसरी समिति के सदस्य के रूप में पूर्व राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद, चक्रवती राजगोपालाचारी, देवदास गांधी, जमनालाल बजाज यहां पहुंचे तो नगर कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष तपस्वी सुंदरलाल ने अपने साथियों के साथ मिलकर तत्कालीन अंग्रेजी डिप्टी कलेक्टर हेमिल्टन से तिरंगा फहराने की अनुमति मांगी। लेकिन हेमिल्टन ने तिरंगे के साथ ही यूनियन जैक का भी झंडा फहराने की शर्त रखी। स्वतंत्रता सेनानियों ने इसे तिरंगे का अपमान माना और इस शर्त को अस्वीकार कर दिया। 18 मार्च 1923 को सुभद्रा कुमारी चौहान, माखनलाल चतुर्वेदी, पं. बालमुकुंद त्रिपाठी, तपस्वी सुंदरलाल टाउन हॉल पहुंचे और योजना बनाकर अंग्रेजों की आंखों में धूल झोंककर टाउन हॉल में दूसरी बार तिरंगा फहराया। इस गुश्ताखी के लिए अंग्रेजों ने कई स्वतंत्रता सेनानियों को गिरफ्तार कर जेल में भेजा और लाठीचार्ज किया गया।
टाउन हॉल से झंडा सत्याग्रह शुरू हुआ था, ये पहली शासकीय इमारत थी, जहां आजादी से पहले तिरंगा फहरा था
- फोटो : सोशल मीडिया
जबलपुर में तिरंगा फहराने और अंग्रेजों की बर्बरता की बातें जब दूर-दूर तक पहुंची तो देश में झंडा सत्याग्रह की शुरूआत हुई। सरदार वल्लभ भाई पटेल ने जबलपुर से झंडा सत्याग्रह की शुरुआत की। इसके बाद नागपुर में झंडा फहराया गया। करीब 10 महीने तक चले झंडा सत्याग्रह के आगे आखिरकार अंग्रेजों को झुकना पड़ा और आंदोलनकारियों की मांगो को मानते हुए 17 अगस्त 1923 देशभर में गिरफ्तार किए गए आंदोलनकारियों को रिहा कर दिया गया, लेकिन उस दौरान भी जबलपुर के आंदोलनकारियों के सबसे अंत में रिहाई दी गई। इसी आंदोलन के दौरान सुभद्रा कुमारी चौहान को अंग्रेजों ने उनकी देशभक्ति से ओत-प्रोत कविताओं के लिए गिरफ्तार किया था। स्वतंत्रता आंदोलन में गिरफ्तार होने वाली वह देश की पहली महिला थीं।
गांधी भवन के नाम से जाना जाता है टाउन हॉल
आजादी के बाद टाउन हॉल को गांधी भवन के नाम से जाना जाता है। यहां एक पुस्तकालय भी है जो 137 सालों से संचालित हो रहा है।
गांधी भवन के नाम से जाना जाता है टाउन हॉल
आजादी के बाद टाउन हॉल को गांधी भवन के नाम से जाना जाता है। यहां एक पुस्तकालय भी है जो 137 सालों से संचालित हो रहा है।
