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मंदिर में पीरियड्स पर चर्चा कर वर्जनाओं को तोड़ा, जागरुकता के लिए सिलेबस में शामिल करने का सुझाव

Tue, 29 May 2018 01:32 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ Updated Tue, 29 May 2018 01:32 AM IST
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women discussed about menstruation in temple.

माहवारी के दिनों में कोई महिला या लड़की मंदिर नहीं जा सकती। ‘उन दिनों’ के पांच दिन तो भगवान की ओर उसकी छाया भी निषिद्ध है। घर में भी टोकाटाकी...अचार मत छुओ...ये मत करो। कोई इस मुद्दे पर बात नहीं करना चाहता। पर, लखनऊ में सोमवार को बदलाव की बयार बही। वह भी मंदिर से। शहर के प्रसिद्ध मनकामेश्वर मंदिर से महंत देव्या गिरि की पहल पर वैचारिक बदलाव की बयार बही। ...और शुरू हो गया अभियान ‘माहवारी शर्मिंदगी नहीं, सेहत की बात’। सोमवार को एक खास दिन था विश्व माहवारी दिवस। इस मौके पर कहीं संगोष्ठी तो कहीं जागरूकता रैली निकाली गई। मनकामेश्वर मंदिर वहीं नई शुरुआत का साक्षी बन रहा था। मंदिर परिसर में जुटीं बुद्धिजीवी महिलाएं समाज की सोच बदलने के लिए नए अभियान को धार दे रही थीं।

women discussed about menstruation in temple.

अभियान की शुरुआत भी सेनेटरी नैपकिन पर हस्ताक्षर के साथ अनूठे अंदाज में की गई।  महंत देव्या गिरि ने बताया कि हम हर महीने सेहत से जुड़े इस मुद्दे सार्वजनिक स्थानों पर जागरूकता अभियान चलाएंगे। अगले साल विश्व माहवारी दिवस पर एक मानव शृंखला का आयोजन किया जाएगा। महंत देव्या गिरि ने इस मौके पर कहा, माहवारी को लेकर तमाम तरह की भ्रांतियों को दूर करना जरूरी है। धर्म के नाम महिलाओं पर प्रतिबंध की बात धर्म की गलत व्याख्या करना है। अब समय आ गया है कि हम नई सोच के साथ आगे बढ़ें। खुल कर बात करें। अपनी समस्याओं को सामने रखें और उनका समाधान तलाशें।

women discussed about menstruation in temple.

बुद्धिजीवी महिलाएं बोलीं- लोगों को ‘बदलाव’ के प्रति सहज बनाना होगा
नवयुग डिग्री कॉलेज की प्रिंसिपल और मनोवैज्ञानिक डॉ. सृष्टि श्रीवास्तव ने इस मौके पर कहा, आमतौर पर ‘उन पांच दिनों’ में भावनात्मक तौर पर कई बदलाव आते हैं। चिड़चिड़ापन, उद्विग्नता जैसे भाव आते-जाते हैं। चूंकि लोग इन बातों को समझते नहीं, जानते नहीं, इसलिए वह बच्चियों के इस व्यवहार को अशिष्टता या उद्दंडता करार देने लगते हैं। हमें लोगों को इस सोच के प्रति जागरूक करना होगा।

प्रसिद्ध पेपर ज्वैलरी डिजाइनर वर्षा श्रीवास्तव ने सवाल उठाया-लड़कियों में होने वाले इस प्राकृतिक बदलाव पर शर्म कैसी? विज्ञान फाउंडेशन की अर्चना पांडेय ने कहा कि जरूरी नहीं कि जो कल तक नहीं बताया गया बच्चियों को आज भी नहीं बताया जाए। यह हर लड़की और महिला की सेहत का मुद्दा है। केजीएमयू की पूर्व सीनियर नर्सिंग सुपरिटेंडेंट शशिबाला सिंह ने महिलाओं के माहवारी संबंधी सवालों का जवाब दिया।

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women discussed about menstruation in temple.

हम यह भी कर सकते हैं...
क्यों न हो मेंस्ट्रुअल हाइजीन पाठ्यक्रम का हिस्सा
जब मंदिर से एक नई बहस छिड़ रही हो। बदलाव की बयार बह रही हो। इस अभियान को और कैसे मजबूती से बढ़ाया जा सकता है इसको लेकर हमने खंगाला कि अन्य देशों में क्या हो रहा है। अन्य देशों से पहले ये जान लीजिए कि अपने ही देश में आंध्र प्रदेश सरकार ने हाल ही में 13 जिलों के 122 स्कूलों में तेलगू भाषा में मेंस्ट्रुअल हाइजीन को लेकर तैयार कराई गई किताबें बांटी हैं। बात विश्व की करें तो 18 देशों में अलग-अलग भाषाओं में कॉमिक बुक के जरिए बच्चों को इसके बारे में जानकारी दी जा रही है। तो फिर क्यों अपना यहां नहीं? हमने शिक्षकों और शिक्षा विभाग के अफसरों से इस मुद्दे को लेकर बात की तो सबने इस पर अपनी सहमति दिखाई ।

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सिलेबस में शामिल हो या नहीं पर जागरूक करना जरूरी
लामार्टीनियर गर्ल्स  की प्रिंसिपल आश्रिता दास ने कहा, पीरियड्स को लेकर सही जानकारियां देने और इसको लेकर भ्रम को दूर करने के लिए हम साल में कम से कम दो वर्कशॉप बच्चों के लिए करते हैं। मेरा मानना है कि लड़का हो या लड़की, दोनों के लिए इसकी सही जानकारी जरूरी है। सिलेबस में शामिल हो या नहीं, लेकिन जागरूक करना जरूरी है।

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