कभी हवा में उछालते थे, कभी करतब दिखाते थे। मेरी एक मुस्कान के लिए कभी हाथी कभी घोड़ा बन जाते थे। सो सकूं मैं पूरी रात चैन के साथ, इसलिए वे पूरी रात एक करवट में गुजारते थे...। यह अल्फाज सिर्फ मेरे या आपके नहीं, किसी लड़के या लड़की के नहीं बल्कि हर बेटे और बेटी के हैं, जिनके पास हैं पापा। या फिर उनके भी जिनके पिता इस दुनिया में तो नहीं, पर यादें, उनकी सीख उनका दिया बेफिक्र बचपन और बेलौस जवानी और सबसे बढ़कर एक ऐसी पहचान जिसने हमें सिर उठाकर दुनिया की चुनौतियों का सामना करने के लायक बनाया।
अच्छा लगता है जब लोग कहते हैं मैं पिता जैसी हूं, यहां पढ़ें फादर्स डे पर स्पेशल स्टोरीज
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हमारी फिक्र में बढ़ाया हौसला, जीती जिंदगी से जंग
ऐसे पिता खुशनसीब को ही मिलते हैं, जो अपने बच्चों की खातिर मौत से लड़ जाएं। बात 1998 की है जब मैं 12 साल की थी। पिता डॉ. जेएन बुधवार को थैलीसीमिया था और बदकिस्मत से उनका एक्सीडेंट हो गया। थैलीसीमिया होने के कारण दुघर्टना के बाद उनके पूरे शरीर से खून बह रहा था। डॉक्टर भी परेशान थे, पर उन हालातों में भी पिता सिर्फ एक ही शब्द बोल रहे थे मुझे अभी जिंदा रहना है अपनी बेटियों के लिए। उनके इसी हौसले ने उन्हें जिदंगी दी और 7-8 माह बाद वह ठीक हो गए। परिवार में मां प्रमिला बुधवार के अलावा बड़ी बहन इंजीनियर हैं। वह अक्सर बाहर रहती हैं। मेरे पिता हमारी बैक बोन थे जिनके बगैर मेरा डॉक्टर बनने के सपना कभी पूरा नहीं हो पाता। हालांकि अब वो हमारे बीच नहीं हैं। - डॉ. निमिशा बुधवार (डॉ. निमिशा अपने पिता डॉ. जेएन बुधवार के साथ।)
पिता ने दोहरी भूमिका में निभाया फर्ज
पिता का प्यार क्या होता है यह हमें तब पता चला जब मैने अपने पिता को दोहरी भूमिका में देखा। अगर वह पिता बनके डांटते थे तो अगले ही पल मां की भूमिका में हम सब भाई बहनों को गले लगाते थे। हालांकि मेरे वालिद शुरूआत में सख्त मिजाज के थे। मां के न रहने के बाद जैसे उनका व्यक्तित्व ही बदल गया। बड़ी बहन के अलावा मैं करीब 13-14 वर्ष का था। छोटी बहन 9-10 वर्ष की जब मां नहीं रहीं। पिता सरकारी नौकरी करते थे। परिवार में हम भाई बहनों के अलावा कोई और बड़ा नहीं था। इस हादसे के बाद से ही मेरे पिता ने दोनों जिम्मेदारियां अपने सिर ले लीं। स्कूल की तैयारी से लेकर मां का हर फर्ज उन्होंने बखूबी निभाया और आज भी निभा रहे हैं। आज हमारी पढ़ाई भी लगभग पूरी होने को है। - मो. अदनान, छात्र (मो. अदनान पिता के साथ।)
अच्छा लगता है जब लोग कहते हैं मैं पिता की जैसी हूं
पिता प्रो. पूरन सिंह लखनऊ में ही डिग्री कॉलेज में प्रोफेसर थे। हमारे परिवार में तीन बहनें और एक भाई है। उस जमाने में जब लोग बेटों की ज्यादा तरजीह देते थे तब मेरे पिता ने बड़े भैया के साथ हम तीनों बहनों को भी बराबर की शिक्षा और स्थान दिलाया। मुझे उनके महत्व का एहसास उस दिन सबसे ज्यादा हुआ जब शादी के बाद मैं खुद पारिवारिक समस्याओं से गुजरी। मां के साथ का अंदाजा सबको होता है पर उस मौके पर मेरे पिता ने मां से भी बढ़कर मेरा सहयोग किया। उन्होंने पूरी जिंदगी मेरा ध्यान रखा। मेरे पिता खुली विचारधारा, शांत स्वभाव और सादगी पसंद व्यक्ति थे। अच्छा लगता है जब लोग मुझसे कहते हैं कि मैं अपने पापा की तरह हूं।
- प्रो. शर्मिला सिंह, प्रबंधक पायनियर मांटेसरी स्कूल (पिता पूरन सिंह के साथ प्रो. शर्मिला सिंह)
मां के बाद, मां-पिता दोनों का फर्ज निभाया
जब मेरी मां का स्वर्गवास हुआ तब मैं छठवीं क्लास में थी। बड़ी बहन प्रीतिका 7वीं में थी। उन्हें हृदय रोग की समस्या थी। घर में पिता अशोक श्रीवास्तव और हम दोनों बहनों के अलावा कोई और नहीं था। मां के लाड़-प्यार में कभी हमने घर के किसी काम में रुचि नहीं ली। पिता बैंक में अकाउंटेंट थे, नौकरी के चलते हमारे लिए समय निकाल पाना आसान नहीं था। पर, मुझे अच्छे से याद है स्कूल की तैयारी से लेकर अपने हाथों खाना खिलाना तक उन्हें भाता था। उन्होंने दोस्त की तरह हमें समझाया। मस्ती करना हो या टीचर की तरह पढ़ाई करवाना। उन्होंने सभी भूमिकाएं अच्छे से निभाईं। उन्होंने हमें मां का भी प्यार दिया। मैं बैंक में जॉब करती हूं और बहन भी डिग्री कॉलेज में प्रोफेसर हैं। शादी के बाद भी हम हर वक्त उनके संपर्क में रहते हैं। मां के तरह उनसे अपनी जिंदगी की हर बात साझा करती हूं। - वर्तिका श्रीवास्तव, बैंक कर्मचारी विकासनगर (वर्तिका श्रीवास्तव अपने पिता अशोक श्रीवास्तव के साथ।)