प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अयोध्या यात्रा पूरी तरह भक्ति भाव में डूबी दिखी। हर क्षण व हर कदम पर मोदी पूरी तरह श्रद्धा के सरोकारों में डूबे दिखे। यह बात दीगर है कि उनके श्रद्धा के सरोकारों की मौन मुद्राएं भी लोगों के मनों में मुखर होकर बैठती दिखीं। साथ ही प्रतीक बनकर सियासी समीकरणों को धार देने में भी कसर नहीं छोड़ी।
हो भी क्यों न आखिर श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण की शुरुआत के साथ वह करोड़ों लोगों की 500 वर्षों की प्रतीक्षा को पूर्णता और सपनों को साकार करने का माध्यम जो बन रहे थे। प्रधानमंत्री की अयोध्या यात्रा की हर मुद्रा व भाव-भंगिमा तथा वेशभूषा इस मौके के मनोभावों का पूरी तरह प्रकटीकरण कर रही थी।
मोदी लोकभावों की बड़ी समझ जो रखते हैं। तभी तो 2014 में अपने नेतृत्व में आजाद भारत में पहली बार भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने के बाद वह जब लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर संसद पहुंचे थे तो उन्होंने संसद भवन की सीढ़ियों पर माथा टेककर आने वाली राजनीति के बड़े संकेत दे दिए।
उसी तरह उन्होंने आज रामलला के सामने जब साष्टांग दंडवत, दर्शन, पुजारियों व संतों के प्रति सम्मान, आरती से लेकर कोदंड राम की मूर्ति हाथों में लेते समय व डाक टिकट जारी करते समय पर जिस तरह का भाव दिखाया उससे वह 500 वर्षों की प्रतीक्षा को साकार करते हुए भविष्य के प्रसाद का भी प्रबंध कर गए। मोदी की मुद्राओं ने आस्था व संविधान दोनों में संतुलन बनाने और आलोचकों को मुंह बंद करने के लिए मुखरता से ज्यादा मौन का सहारा लिया।
मोदी ने अपने हाव-भाव से इस यात्रा को एक भक्त की भगवान के दरबार की यात्रा के रूप में ही बांधे रखने की कोशिश की। रामलला के दरबार में साष्टांग दंडवत और जन्मभूमि की मिट्टी का तिलक की स्मृतियों ने उन्हें लोगों के दिलों में गहरे से उतार दिया।