नाक से खून निकलने पर हो जाएं सतर्क, हो सकते हैं इस बीमारी के शिकार, बच्चों में पाई जाती है यह डिजीज
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बलरामपुर निवासी रामलौटन (15) के दाहिनी आंख की रोशनी धीरे-धीरे कम हो गई। उसके नाक से लगातार खून बह रहा था। परिवारीजन इसे नकसीर फूटना मान रहे थे, लेकिन यह समस्या खत्म होने का नाम नहीं ले रही थी। इस पर परिवार के लोग उसे लेकर केजीएमयू आए। यहां ईएनटी विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. एचपी सिंह ने जांच की। ब्रेन की एमआरआई कराई गई। इसके बाद पेरिफेरल नर्वस सिस्टम (पीएनएस) की जांच में बीमारी पकड़ में आई। जांच में पता चला कि उसके नाक के पिछले हिस्से में ट्यूमर है। इस बीमारी को चिकित्सकीय भाषा में नैसोफेरियांगल एंजियोफाइब्रोमा करते हैं। मरीज के पास आयुष्मान योजना का कार्ड था। इसलिए ऑपरेशन के लिए आयुष्मान योजना की कार्रवाई पूरी की गई और 26 अप्रैल को ऑपरेशन से ट्यूमर को निकाल दिया गया। करीब 12 ग्राम के इस ट्यूमर को निकालने में 1200 एमएल खून निकला। इसकी रिकवरी के लिए मरीज को दो यूनिट ब्लड चढ़ाया गया।
डॉ. एचपी सिंह ने बताया कि यह ट्यूमर नाक के पिछले हिस्से में होता है। दिमाग की नसें भी सटी हुई होती हैं। अंतिम हिस्से में नाक, कान और आंख की नसों आपस में सटी होती हैं। दिमाग की नसें भी वहीं जुड़ती हैं। ऐसे में सिर के आंतरिक हिस्से का यह सबसे खास स्थान होता है। यहां जरा सी चूक होने पर कोई न कोई नस प्रभावित होने का डर रहता है। ऐसी स्थिति में एनेस्थीसिया देना बड़ी चुनौती होती है। आमतौर पर इसे लोकल एनेस्थीसिया के जरिये भी बेहोशी दी जाती है। इस मर्ज के समय से पकड़ में न आने पर ट्यूमर बढ़ जाता है। वह मस्तिष्क की नसों को दबा देता है। इससे मरीज की मौत भी हो सकती है।
डॉ. एचपी सिंह ने बताया कि यह ट्यूमर नाक के पिछले हिस्से में होता है। दिमाग की नसें भी सटी हुई होती हैं। अंतिम हिस्से में नाक, कान और आंख की नसों आपस में सटी होती हैं। दिमाग की नसें भी वहीं जुड़ती हैं। ऐसे में सिर के आंतरिक हिस्से का यह सबसे खास स्थान होता है। यहां जरा सी चूक होने पर कोई न कोई नस प्रभावित होने का डर रहता है। ऐसी स्थिति में एनेस्थीसिया देना बड़ी चुनौती होती है। आमतौर पर इसे लोकल एनेस्थीसिया के जरिये भी बेहोशी दी जाती है। इस मर्ज के समय से पकड़ में न आने पर ट्यूमर बढ़ जाता है। वह मस्तिष्क की नसों को दबा देता है। इससे मरीज की मौत भी हो सकती है।
इस बीमारी को होने के कारणों पर शोध चल रहा है। यह बालकों में ही पाया जाता है। बालिकाओं में यह बीमारी नहीं के बराबर पाई जाती है। इस वजह से माना जाता है कि इसके पीछे बड़ी वजह हार्मोन्स का प्रभाव है। यह समस्या आठ से 15 साल के बीच होती है। यानी किशोरावस्था में कई तरह से हार्मोनल बदलाव होते हैं। माना जा रहा है कि यह समस्या भी इसी से जुड़ी हुई है।