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कोरोना: अपने भी हो रहे बेगाने...घर के सामान छूने पर भी पाबंदी, बर्तन भी अलग, देखें तस्वीरें
Sat, 23 May 2020 12:16 PM IST
शाहरुख खान
अमर उजाला नेटवर्क, लखनऊ
अमर उजाला नेटवर्क, लखनऊ
Published by: शाहरुख खान
Updated Sat, 23 May 2020 12:16 PM IST
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migrant people
- फोटो : अमर उजाला।
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कोरोना का ऐसा खौफ! गांव के लोगों की क्या कहें अपनों ने भी दूरी बना ली। रिश्ते जिनमें कभी गर्माहट थी, जो अपनों पर जान छिड़कते थे, वो भी बेगाने हो गए। अपनापन दिखाएं भी तो कैसे? खुद की जान को भी तो खतरा है। ऐसे में बिस्तर-बर्तन अलग कर रहे हैं। घर के बाहर ही अपनों को क्वारंटीन कर रहे हैं। डर ऐसा घर कर गया है कि कई जगह तो टकराव की नौबत आ रही है। जो फिजां कभी अपनेपन के लिए जानी जाती थी, उसमें कड़वाहट घुलने लगी है। तनाव बढ़ रहा है। गांवों में बदलते हालात पर पेश है रिपोर्ट...।
migrant people
- फोटो : अमर उजाला।
निगोहां के नया खेड़ा निवासी नन्हा 17 मई को दिल्ली से गांव आए। मां फुलवासी रोते-रोते बताती हैं कि माहौल को देखते हुए उन्होंने घर के बगल में पंचायत घर में बेटे को भेज दिया है। हालांकि हम घर में ही उन्हें क्वारंटीन करना चाहते थे। नन्हा शौच के लिए निकलने में भी डरते हैं, कहते हैं कि दरअसल हर कोई संक्रमण को लेकर आशंकाओं से घिरा है। प्रशासन से भी कोई सहायता नहीं मिल रही है। फुलवासा कहती हैं कि बेटे को दूर से ही देखकर लौट आती हूं।
पैदल चलते प्रवासी मजदूर (फाइल फोटो)
- फोटो : PTI
मनरेगा में काम तो मिला, लेकिन साथी दूर भागते थे
निगोहां के अघईया निवासी शिवकुमार व समरजीत 27 मार्च को दिल्ली से गांव पहुंचे थे। गांव वालों नें जमकर विरोध किया, लेकिन मिन्नतों के बाद घर में ही क्वारंटीन किए जाने पर राजी हुए। 14 दिन बाद मनरेगा में काम करने पहुंचे शिवकुमार बताते हैं कि काम के दौरान सभी मजदूर साथी मुझसे दूर भागते थे। सभी को समझाते-समझाते अब जाकर गाड़ी पटरी पर आई।
निगोहां के अघईया निवासी शिवकुमार व समरजीत 27 मार्च को दिल्ली से गांव पहुंचे थे। गांव वालों नें जमकर विरोध किया, लेकिन मिन्नतों के बाद घर में ही क्वारंटीन किए जाने पर राजी हुए। 14 दिन बाद मनरेगा में काम करने पहुंचे शिवकुमार बताते हैं कि काम के दौरान सभी मजदूर साथी मुझसे दूर भागते थे। सभी को समझाते-समझाते अब जाकर गाड़ी पटरी पर आई।
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migrant people
- फोटो : अमर उजाला।
लखनऊ के माल क्षेत्र में बीते एक सप्ताह में बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूर पहुंचे हैं। इन्हें पंचायत भवनों, घरों, स्कूलों में क्वारंटीन किया गया था, लेकिन वे खुलेआम घूम रहे थे। ग्रामीण इलाकों में कोरोना संक्रमितों की संख्या बढ़ने से सबकी चिंता बढ़ी। गांव वाले सख्त हो गए और ऐसे लोगों को गांव से निकाले जाने की बात उठने लगी। परिवारीजनों ने हालात को समझा और खुद ही अपने प्रियजन पर पाबंदी लगानी शुरू कर दी। फिलहाल घर आए लोग क्वारंटीन की अवधि तक खुले में नहीं घूमेंगे। रज्जन सिंह इनमें से एक हैं, जिन्हें अपने घर में हैंडपंप, चारपाई व अन्य सामान छूने तक की मनाही है। उनका बर्तन, बिस्तर, बाल्टी, मग सब अलग कर दिया गया है।
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प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : अमर उजाला
भय के मारे अलग कमरे में बंद किया, वहीं दे रहे खाना-पानी
सरोजनीनगर क्षेत्र में अब तक कुल 575 कामगार दूसरे शहरों से लौटकर आए हैं। पर ज्यादातर की पीड़ा है कि गांव वालों के साथ-साथ घर वाले भी परायों जैसा व्यवहार कर रहे हैं। सरोजनीनगर के बंथरा,नटकुर, रहीमाबाद व बिजनौर ग्राम पंचायतों में लौटे कामगारों का कहना है कि उन्हें एक कमरे में सीमित कर दिया गया है। यही नहीं कुछ परिवारों में तो इतना भय है कि वे कामगारों को बाहर ही नहीं निकलने दे रहे हैं। यहां के नटकुर गांव में मुबंई से लौटकर आए शशिकांत को पत्नी सरिता एवं बेटे के साथ घर वालों ने एक कमरे में रख दिया है और उन्हें वहीं पर खाना-पानी दिया जा रहा है।
सरोजनीनगर क्षेत्र में अब तक कुल 575 कामगार दूसरे शहरों से लौटकर आए हैं। पर ज्यादातर की पीड़ा है कि गांव वालों के साथ-साथ घर वाले भी परायों जैसा व्यवहार कर रहे हैं। सरोजनीनगर के बंथरा,नटकुर, रहीमाबाद व बिजनौर ग्राम पंचायतों में लौटे कामगारों का कहना है कि उन्हें एक कमरे में सीमित कर दिया गया है। यही नहीं कुछ परिवारों में तो इतना भय है कि वे कामगारों को बाहर ही नहीं निकलने दे रहे हैं। यहां के नटकुर गांव में मुबंई से लौटकर आए शशिकांत को पत्नी सरिता एवं बेटे के साथ घर वालों ने एक कमरे में रख दिया है और उन्हें वहीं पर खाना-पानी दिया जा रहा है।