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'उमराव जान' के तरानों के बहाने दिलों में हमेशा बसे रहेंगे खय्याम, लखनऊ के इस जायके के थे मुरीद
Tue, 20 Aug 2019 04:45 PM IST
Amulya Rastogi
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
Published by: Amulya Rastogi
Updated Tue, 20 Aug 2019 04:45 PM IST
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खय्याम
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एक तुम ही नहीं तनहा, उल्फत में मेरी रुसवा.., इस शहर में तुम जैसे दीवाने हजारों हैं..। शहर के फिल्मकार मुजफ्फर अली की फिल्म उमराव जान, गीतकार शहरार के बोल और खय्याम का संगीत। शहर की गलियों, बाजारों, घरों और महफिलों में जब भी ये बजता तो रेखा की अदाकारी के साथ खय्याम का दिलकश संगीत भी लोगों के दिलों में उतरता चला जाता और हजारों को उनके संगीत का दीवाना बनाकर ही मानता।
खय्याम
- फोटो : amar ujala
खय्याम शहर के नहीं थे, लेकिन उमराव जान फिल्म में संगीत से लखनऊ नवाबी नगरी का नया अक्श दर्शाने के बाद से उनका लखनऊ से संगीत के जरिये वो रिश्ता बना कि वो लखनऊ को अपना दूसरा घर ही मानने लगे। फिल्मकार मुजफ्फर अली के बाद शहर में खय्याम के सबसे करीबी रहे नौशाद संगीत केंद्र के अध्यक्ष और हिंदी उर्दू अवाड कमेटी के सचिव अतहर नबी ने बताया कि जब भी कभी टीवी-अखबार वालों को वो साक्षात्कार देते तो लखनऊ को दर्शाती उमराव जान का जिक्र करना नहीं भूलते।
खय्याम
खुद हमसे भी कई बार मुलाकात में कह चुके थे उमराव जान ने उन्हें पहचान दी तो उसके संगीत ने उन्हें लोगों के दिल भीतर बसाया। संगीत के क्षेत्र में नौशाद को अपना आदर्श मानने वाले खय्याम को वर्ष 2009 में नौशाद संगीत केंद्र की ओर से नौ शाद सम्मान से नवाजा गया। यही नहीं वर्ष 2012 में जब एक और बालीवुड की शख्सियत को अवार्ड दिया गया तो वे उस समारोह केअतिथि रहे। अमूमन जल्दी सो जाने वाले अतहर नबी सोमवार देर रात खय्याम के निधन की सूचना पत्रकारों से ही पाने के बाद फिर सो न सके।
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अतहर नबी
- फोटो : amar ujala
लखनऊ के मुगलई जायके के मुरीद थे खय्याम
अतहर नबी ने बताया कि खय्याम साहब से उनकी मुलाकात करीब 30-32 साल पहले साहिर लुधियानवी केघर पर ही हुई थी। वे उन दिनों फिल्म के अलावा किसी बड़े टीवी सीरियल पर भी काम कर रहे थे, मुलाकात से पहले भी वो लखनऊ आया जाया करते थे, लेकिन मुझसे कुछ मुलाकातों के बाद उनका अक्सर फोन मेरे पास भी आता, लखनऊ के हालचाल लेते और जब मैं आने को कहता तो वे कुछ जायकेदार खिलाने का वादा भी लेते। लखनऊ के कबाब के जायकों के अलावा उन्हें मुगलई जायके खासे पसंद थे।
अतहर नबी ने बताया कि खय्याम साहब से उनकी मुलाकात करीब 30-32 साल पहले साहिर लुधियानवी केघर पर ही हुई थी। वे उन दिनों फिल्म के अलावा किसी बड़े टीवी सीरियल पर भी काम कर रहे थे, मुलाकात से पहले भी वो लखनऊ आया जाया करते थे, लेकिन मुझसे कुछ मुलाकातों के बाद उनका अक्सर फोन मेरे पास भी आता, लखनऊ के हालचाल लेते और जब मैं आने को कहता तो वे कुछ जायकेदार खिलाने का वादा भी लेते। लखनऊ के कबाब के जायकों के अलावा उन्हें मुगलई जायके खासे पसंद थे।
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खय्याम
उमराव जान के बहाने लखनऊ के दिल में बस गये खय्याम
लोगों को उमराव जान केगाने जुबां पर रटे हैं, उसका संगीत खय्याम साहब का ही था। संगीत के जरिये वो हर लखनवी के दिल में दशकों पहले उतर गये, बस गये। उनके कद का संगीतकार हरदम अच्छी नज्में सुनने को बेताब रहता, ये देखकर हमेशा हैरत होती। कुछ समय पहले जब वो लखनऊ आये तो भी कुछ ऐसे लोगों से मिलने का इरादा जताया, जो अचछा लिखते सुनाते हों। कुछ शायरों, युवा शायरों से मुलाकात करवाई। चूंकि लखनऊ उनका पहले से ही काफी घूमा हुआ था, फिर भी वो अक्सर कई जगहों का हाल लिया करते थे। एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी डीसी पांडे ने उन दिनों कुछ अच्छी नज्मों की किताब लिखी थी, उसे पढ़का उन्हें अच्छा लगा। बाद में उन्होंने उसका विमोचन भी किया।
लोगों को उमराव जान केगाने जुबां पर रटे हैं, उसका संगीत खय्याम साहब का ही था। संगीत के जरिये वो हर लखनवी के दिल में दशकों पहले उतर गये, बस गये। उनके कद का संगीतकार हरदम अच्छी नज्में सुनने को बेताब रहता, ये देखकर हमेशा हैरत होती। कुछ समय पहले जब वो लखनऊ आये तो भी कुछ ऐसे लोगों से मिलने का इरादा जताया, जो अचछा लिखते सुनाते हों। कुछ शायरों, युवा शायरों से मुलाकात करवाई। चूंकि लखनऊ उनका पहले से ही काफी घूमा हुआ था, फिर भी वो अक्सर कई जगहों का हाल लिया करते थे। एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी डीसी पांडे ने उन दिनों कुछ अच्छी नज्मों की किताब लिखी थी, उसे पढ़का उन्हें अच्छा लगा। बाद में उन्होंने उसका विमोचन भी किया।