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समानता के अधिकार से लेकर मानवाधिकार तक के लिए लड़ रहीं ये सोशल फाइटर्स, जानें- इनके बारे में
lucknow, uttar pradesh, india
Published by: ishwar ashish
Updated Tue, 05 Mar 2019 11:52 AM IST
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जो तूफानों में पलते जा रहे हैं, वही दुनिया बदलते जा रहे हैं।
चुनौतियों से उन्हें प्यार है। गलत बर्दाश्त नहीं, फिर चाहे वो अपने खिलाफ हो या किसी और के। हर गलत के खिलाफ आवाज बुलंद करते हुए वे आगे बढ़ रही हैं। तूफानों ने उन्हें पाला है तो भला राह की मुश्किलें हौसला क्या तोड़ेंगी। बात शिक्षा की हो या लोगों के स्वास्थ्य की। किसी के लिए कानून की लड़ाई लड़नी हो या फिर नारी के आत्म सम्मान की बात। समानता के अधिकार से लेकर मानवाधिकार तक के लिए उन्होंने मोर्चा खोल दिया है। आज हम बात करते हैं इन्हीं सोशल फाइटर्स की...। रोली खन्ना की रिपोर्ट...
किसी की जिंदगी संवारने का संकल्प
कोई होम मेकर है तो कोई कामकाजी। एक बात उनमें सामान्य है कि वे अपनी-अपनी जिम्मेदारी को लेकर सजग हैं। परिवार और घर के बीच तालमेल बैठाते हुए उन्होंने अपने दिनभर के कुछ घंटे समाज के उस तबके के नाम कर रखे हैं, जो अभावों में जी रहे हैं।
सहेलियों के इस ग्रुप की कोशिशों की बदौलत गोमती नगर के प्राथमिक विद्यालय तखवा-2 के 120 बच्चों का भविष्य संवरने लगा है। इसके अलावा यह ग्रुप बेटियों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के मद्देनजर उनके प्रशिक्षण के लिए प्रयासरत है। साथ ही निवेदिता कुष्ठ रोगियों के लिए फैजाबाद में एक मुहिम छेड़े हुए हैं।
कॉन्वेंट की तर्ज पर स्कूल में बदलाव
निवेदिता बताती हैं कि हम सबने मिलकर स्कूल गोद लिया है। कोई पैसे से तो कोई अन्य मदद कर रहा है। कल तक जर्जर दिख रहे स्कूल में चारदीवारी बन गई, वायरिंग हो गई। टेबल-कुर्सी के साथ-साथ लाइब्रेरी और गेम रूम भी है। हम खुद वहां जाते हैं और मॉनिटरिंग करते। नियमित रूप से बच्चों के माता-पिता के साथ संवाद करते हैं। (तस्वीर में, स्वाति, निवेदिता, गरिमा, मंजु, राधिका, रुचि, प्रियंका, प्रीति, राखी, रितु, शालू, दीक्षा और गरिमा।)
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सामाजिक यज्ञ में एक आहुति इनकी भी
‘मदद करने के लिए संगठन बनाना जरूरी नहीं, किसी जरूरतमंद के काम आने के जरिए बहुत हैं।’
पिता सिविल सेवा से रिटायर होने के बाद पेंशनधारकों के हक के लिए संघर्ष करते रहे। उनकी बदौलत ऐसा माहौल मिला, जिसमें हमने लोगों के काम आना सीखा। छोटे-छोटे प्रयास चलते रहे। जब हम दोनों रिटायर हुए तो तय किया कि अब सामाजिक यज्ञ में एक आहुति हमारी भी पड़नी चाहिए। यह संकल्प है अवध गर्ल्स पीजी कॉलेज से सेवानिवृत्त शिक्षिका डॉ. प्रतिमा भाटिया और नारी शिक्षा निकेतन से रिटायर्ड शिक्षिका मधु भाटिया का। दोनों बहनें समाज के विभिन्न जरूरतमंद तबके के जीवन में अपने-अपने स्तर से रोशनी भर रही हैं।
डॉ. प्रतिमा तो आकांक्षा समिति की एकमात्र ऐसी अध्यक्ष हैं, जिन्हें आईएएस अफसर की पत्नी न रहने के बावजूद चुना गया। वे कहती हैं, मेरी थीसिस कामकाजी महिलाओं पर थी। इस कारण महिलाओं की समस्याओं को करीब से जानने का मौका मिला। फिर एंथ्रोपोलॉजी पढ़ाते वक्त जब अपने स्टूडेंट्स से फील्ड वर्क कराती थी, तब बड़ी संख्या में संस्थाओं को जानने का मौका मिला। कुछ समय बुजुर्गों के साथ बीता। वहीं मानसिक तौर पर कमजोर लोगों के संपर्क में आकर उनकी हकीकत को जान सकी।
किसी के काम आना ही मकसद
डॉ. प्रतिमा व मधु भाटिया कहती हैं कि हमने दो बच्चों को गोद लिया है। सात साल के जिस बच्चे को गोद लिया, वह आज अपने पैरों पर न केवल खड़ा है, बल्कि दूसरों को प्रशिक्षित कर रहा है। वहीं, दूसरा अभी दसवीं का एग्जाम दे रहा है।
वे कहती हैं, हम आकांक्षा, नेशनल एसोसिएशन फॉर द ब्लाइंड व समर्थ फाउंडेशन जैसी संस्थाओं से जुड़े हैं। लोग हमें पुराने कपड़े, सामान व अन्य चीजें दे जाते हैं, जिन्हें हम जरूरतमंदों तक पहुंचा देते हैं। इसके अलावा किसी को आर्थिक मदद देनी हो तो हम अपने जानने वालों से कलेक्शन कर मदद करते हैं। (तस्वीर में समाजसेवी, प्रतिमा भाटिया व मधु भाटिया)
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बाल व महिला अधिकारों की पैरोकार ‘आप सही हैं तो आत्मविश्वास से स्वीकार कीजिए, डरने की जरूरत नहीं।’
कुछ करने की चाहत में 1999 में यूं ही महिला समाख्या से जुड़ गई। मुख्य रूप से सरकारी सहयोग से चल रहा यह संगठन बेसिक शिक्षा के जरिेए महिलाओं के उत्थान में लगा था। वक्त के साथ-साथ दायरे बढ़े और हम बाल शोषण, बाल विवाह और घरेलू हिंसा के खिलाफ सक्रिय हुए। यह कहना है महिला समाख्या की स्टेट प्रोग्राम कोऑर्डिनेटर डॉ. स्मृति सिंह का। उत्तर प्रदेश के 19 जिलों में बाल व महिला अधिकारों के हक की लड़ाई लड़ रही हैं स्मृति। (तस्वीर में डॉ. स्मृति सिंह, स्टेट प्रोग्राम कोऑर्डिनेटर, महिला समाख्या)
20 हजार से अधिक मामले सुलझाए
स्मृति बताती हैं कि सामुदायिक संगठन या संघ निर्माण के जरिए काम कर रहे हैं। यही स्वयंसेवी कार्यकर्ता चेंजमेकर्स की भूमिका निभा रहे हैं। हम इन्हीं लोगों के जरिए समस्या प्रधान इलाकों तक जाते हैं। साक्षरता दर, हिंसा की दर और लिंगानुपात में अंतर के आधार पर काम करने के लिए क्षेत्र चुनते हैं। अभी तक उत्तर प्रदेश में हम 2.5 लाख महिला शैक्षिक कार्यकर्ता तैयार कर चुके हैं। ये सीधे 10 लाख परिवारों से जुड़ी हैं। यह एकमात्र ऐसा कार्यक्रम है जो महिलाओं के लिए महिलाओं द्वारा चलाया जा रहा है। हमारा नेटवर्क मजरा, पंचायत, ब्लॉक , जिला और राज्य तक तैयार हो चुका है। एक साल में हम घरेलू हिंसा के 20 हजार से अधिक मामले सुलझा चुके हैं।
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मानवाधिकार व सतत विकास के लिए सक्रिय
‘कोशिशें सर्वश्रेष्ठ की कीजिए, बेहतर परिणाम जरूर हासिल होंगे।’
बस एक सोच थी कि सोशल वर्क किया जाए। कोई राह तय नहीं थी, एक एनजीओ बना लिया 2004 में होली विजन इंटरनेशनल नाम से। बाद में पता चला कि एनजीओ बना लेना और समाज के लिए कुछ करना दो अलग-अलग चीजें हैं। इस बीच शिक्षा के बढ़ते व्यवसायीकरण को देखकर इच्छा हुई कि बच्चों की सस्ती पढ़ाई के लिए कुछ किया जाए। ...और फिर नींव पड़ी सेंट जेवियर्स स्कूल की। क्वालिटी एजुकेशन के लिए वर्ल्ड एजुकेशन समिट 2016 में सर्वश्रेष्ठ शिक्षाविद् का अवॉर्ड मिला। यह कहना है यूथ फॉर ह्यूमन राइट्स इंडिया की नेशनल प्रेसीडेंट व शिक्षाविद् डॉ. अर्जुमंद जैदी का। (तस्वीर में, डॉ. अर्जुमंद जैदी/नेशनल प्रेसीडेंट, यूथ फॉर ह्यूमन राइट्स इंडिया)
सोच बदलने की कोशिश
डॉ. जैदी बताती हैं कि कोफी अन्नान के समय में यूएन ग्लोबल कॉम्पैक्ट की शुरुआत हुई थी, जिसमें कॉरपोरेट और एनजीओ को साथ मिलकर आगे बढ़ना था। इसी के तहत हम संयुक्त राष्ट्र से जुड़े। मानवाधिकार और सतत विकास के लक्ष्य के लिए संयुक्त राष्ट्र ने हमें जिम्मेदारी सौंपी है। देश भर में हम 8000 वॉलंटियर्स तैयार कर चुके हैं, जिन्हें 48 डायरेक्टर निर्देशित कर रहे हैं। 2017 से यूथ फॉर ह्यूमन राइट्स इंडिया के तहत हम देश भर के स्कूल-कॉलेज में स्टूडेंट्स से संवाद के जरिये संयुक्त राष्ट्र के लक्ष्य को पाने के लिए प्रयासरत हैं।
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लाइलाज बीमारी के खिलाफ जंग
‘लाइलाज बीमारी के खिलाफ किसी को तो खड़ा होना होगा, तो वो हम क्यों नहीं हो सकते।’
बात 2002 की है। बेटी अचानक बीमार पड़ी और लंबे समय तक बुखार ने उसे नहीं छोड़ा। हम उसे दिखाने केजीएमयू ले गए। वहां एक बीमार बच्चा था, जिसे पैसे की कमी के चलते लौटाया जा रहा था। हमने उसके इलाज का खर्च दिया। इसके बाद मेरी बेटी ठीक होने लगी, लगा उस बच्चे के माता-पिता की दुआ लग गई। तब हमने खुद से वादा किया कि किसी बच्चे को अब पैसे की कमी के चलते बिना इलाज नहीं लौटने देंगे। हमने सोचा कि यदि हमें इसे एक जन आंदोलन का रूप देना है तो लोगों को जोड़ना होगा और मदद भी लेनी होगी। इसी सोच के साथ 2005 में ईश्वर चाइल्ड वेलफेयर फाउंडेशन की स्थापना की। (तस्वीर में सपना उपाध्याय, ईश्वर चाइल्ड वेलफेयर फाउंडेशन)
कैंसर से लेकर एचआईवी पीड़ित तक
सपना बताती हैं, हम अकेले चले थे लेकिन आज 8000 से अधिक लोग हमसे जुड़ चुके हैं। कोशिशें रंग लाने लगीं तो सर्वाइवल रेट में भी बढ़ोतरी हुई। ऐसे में बच्चों के पुनर्वास और उनको मुख्यधारा से जोड़ने की चुनौती थी। हमने उनको पढ़ाने की व्यवस्था की, साथ ही उनके माता-पिता को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के प्रयास शुरू किए। इसके लिए कौशल विकास पर फोकस किया। साथ ही हम एचआईवी पेशेंट की मदद के लिए भी प्रयास शुरू कर चुके हैं। हमारा मानना है कि कैंसर जैसी लाइलाज बीमारी पर लोग हाथ डालना नहीं चाहते और हम उन्हीं बीमारियों के खिलाफ आगे बढ़ रहे हैं।
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