{"_id":"5f8ffdda8ebc3e9b987d78cb","slug":"dussehra-2020-famous-dussehra-in-india-why-mysore-and-kullu-dussehra-is-famous-in-india","type":"photo-gallery","status":"publish","title_hn":"Dussehra 2020: विजयदशमी 25 अक्तूबर को, जानिए क्यों मशहूर है मैसूर और कुल्लू का दशहरा","category":{"title":"Lifestyle","title_hn":"लाइफ स्टाइल","slug":"lifestyle"}}
Dussehra 2020: विजयदशमी 25 अक्तूबर को, जानिए क्यों मशहूर है मैसूर और कुल्लू का दशहरा
Wed, 21 Oct 2020 02:59 PM IST
योगेश जोशी
लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: योगेश जोशी
Updated Wed, 21 Oct 2020 02:59 PM IST
विज्ञापन
Dussehra 2020
- फोटो : अमर उजाला
दशहरा का त्योहार पूरे देश में बड़े जोरो -शोरो से मनाया जाता है। इस त्योहार के रंग में हर शहर अपनी तरह से रंग जाता है। हर शहर का दशहरा किसी बात का प्रतीक है। जहां दिल्ली और उत्तर प्रदेश में दशहरा के दिन लोग रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद का पुतला जलाते हैं , वहीं कुल्लू और मैसूर शहर के दशहरा का महत्व और तरीका दोनों ही अलग है। इसलिए यहां का दशहरा दुनियाभर के लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र है। कुल्लू और मैसूर शहर का दशहरा देखने के लिए देश-विदेश से लोग आते हैं। अगली स्लाइड्स में जानिए क्यों है कुल्लू और मैसूर का दशहरा मशहूर...
Dussehra 2020
- फोटो : अमर उजाला
मैसूर
- कर्नाटक के मैसूर शहर में दशहरा का त्योहार बहुत ही भव्य तरीके से मनाया जाता है। इस त्योहार को यहां के लोग दसरा या नबाबबा कहते हैं। इस त्योहार में मैसूर के सबसे मशहूर शाही वोडेयार परिवार सहित पूरा शहर शामिल होता है। मैसूर पैलेस को 10 दिनों तक सजा कर रखा जाता है। साथ ही यहां सांस्कृतिक और धार्मिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं। इसके अलावा महल के मैदान के सामने एक दसारा प्रदर्शन का भी आयोजन किया जाता है।
Dussehra 2020
- फोटो : अमर उजाला
ऐसा माना जाता है कि मैसूर में दशहरा का आयोजन सबसे पहले 15वीं शताब्दी में हुआ था। दशहरा त्योहार का यह आयोजन विजयनगर साम्राज्य के शासकों द्वारा किया गया था। दशहरा के दिन यहां देवी चामुंडेश्वरी की पूजा की जाती है। मैसूर के दशहरे की खासियत यहां का जुलूस है जो अंबा महल से शुरू होता है और मैसूर से होते हुए करीब पांच किलोमीटर और दूर जाता है। इस जुलूस में पंद्रह हाथी लाए जाते हैं जिनके ऊपर देवी चामुंडेश्वरी की मूर्ति को रखा जाता है। इस मूर्ति को बेहद ही खूबसूरत तरीके से सजाया जाता है। इसके साथ नृत्य , संगीत और कई सजाए हुए जानवरों की झांकी भी इस जुलूस में शामिल होती है। सिर्फ इतना ही नहीं इस त्योहार के आखिरी दिन सड़कों पर एक जंबो सवारी का जुलूस भी निकाला जाता है। बच्चे-बड़े सभी इस जुलूस का हिस्सा बनते हैं। हर कोई इस पर्व के रंग में रंग जाता है और माता चामुंडेश्वरी की भक्ति में लीन रहता है। तरह-तरह की झाकियां और पूरे मैसूर को दशहरे के रंग में इस तरह रंगा जाता है , जिसकी वजह से यह सभी लोगों के आकर्षण का केन्द्र बन चुका है।
विज्ञापन
विज्ञापन
Dussehra 2020
- फोटो : अमर उजाला
कुल्लू
- जहां एक तरफ हिमाचल प्रदेश का कुल्लू शहर शांति और अपनी सुंदरता के लिए जाना जाता है। वहीं दशहरा के दिन इस शहर का भव्य आयोजन सभी लोगों के आकर्षण का केंद्र बन जाता है। कुल्लू में दशहरा का त्योहार भी बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। जब पूरे देश में दशहरा खत्म होता है , उसी दिन कुल्लू में दशहरे का उत्सव शुरू होता है। कुल्लू में दशहरे का पर्व सात दिनों तक मनाया जाता है। जहां पूरे देश में दशहरा असत्य पर सत्य की जीत के रूप में मनाया जाता है वहीं कुल्लू में काम, क्रोध, मोह, लोभ और अहंकार के नाश के तौर पर पांच जानवरों की बलि देकर इसे मनाते हैं।
विज्ञापन
Dussehra 2020
- फोटो : अमर उजाला
कुल्लू में दशहरा का यह उत्सव घाटी में मुख्य रूप से ढालपुर मैदान में आयोजित किया जाता है। यह ढालपुर मैदान तरह-तरह के फूलों और रंग-बिरंगी लाइटों से सजाया जाता है। 17वी शताब्दी में यहां राजा जगत सिंह ने रघुनाथ भगवान की एक विशाल प्रतिमा स्थापित की थी। रघुनाथ भगवान श्रीराम के अवतार के रूप में पूजे जाते हैं। दशहरा पर्व की शुरुआत यहां मनाली के हिडिम्बा मंदिर की आराधना से शुरू की जाती है फिर पूरे कुल्लू शहर में रथ यात्रा आयोजित की जाती है। इस रथ यात्रा में रघुनाथ भगवान, सीता माता और हिडिंबा मां की प्रतिमाओं को मुख्य स्थान दिया जाता है। इस रथ को एक जगह से दूसरी जगह लेकर जाते हैं। करीब सौ से ज्यादा देवी-देवताओं को रंग-बिरंगी पालकियों में सजाकर रघुनाथ जी के सम्मान में ले जाया जाता है। दशहरा के छठवें दिन सभी देवी-देवता इकठ्ठा होते हैं जिसे मोहल्ला कहा जाता है। छठवें दिन और पूरी रात भक्त खूब नाचते और गाते हैं। सातवें दिन रथ को व्यास नदी के पास ले जाया जाता है, जहां दहन का भव्य आयोजन किया जाता है। इस दहन में लोग लकड़ियों को जलाते हैं।