#HisChoice: एक पढ़ाकू लड़के के जिगोलो बनने की कहानी
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'जा जाकर ऑफ़िस ही कर ले। यहां क्या कर रहा है फिर।' ये जवाब पाकर मैं चुप हो गया। कुछ ही मिनटों में इस बाज़ार के लिए मैं एक नया माल।।।एक छैला हो गया।वो ट्रांसजेंडर अचानक नरम होकर बोली, "तेरी तस्वीर भेजनी होगी, नहीं भेजी तो कोई बात नहीं करेगा।"ये सुनते ही मेरी हालत ख़राब हो गई। मेरी तस्वीर पब्लिक होने वाली थी। मैं सोच रहा था कि कोई रिश्तेदार देख लेगा तो क्या होगा मेरा भविष्य।पहले दाईं तरफ से, फिर बाईं तरफ से और उसके बाद सामने से मेरी तस्वीर खींची गईं। इसके अलावा दो आकर्षक तस्वीरें भी मांगी गईं।मेरे सामने ही वो तस्वीरें किसी को वॉट्स ऐप पर भेजी गईं। तस्वीरों के साथ लिखा था, 'नया माल है, रेट ज़्यादा लगेगा। कम पैसे का चाहिए तो दूसरे को भेजती हूं।'मेरी बोली लग रही थी, जो अंत में पांच हज़ार रुपये में तय हुई।इसमें मुझे क्लाइंट के लिए सब कुछ करना था। ये सब किसी फ़िल्म में नहीं, मेरे साथ हो रहा था। बहुत अजीब था।मैं ज़िंदगी में पहली बार ये करने जा रहा था। बिना प्यार, इमोशंस के कैसे करता? एक अंजान के साथ करना होगा ये सोचकर मेरा दिमाग चकरा रहा था।एक पीली टैक्सी में बैठकर मैं उसी दिन कोलकाता के एक पॉश इलाके के घर में घुसा। घर के भीतर बड़ा फ्रिज था, जिसमें शराब की बोतलें भरी हुई थीं। घर में काफी बड़ा टीवी भी था।वो शायद 32-34 साल की शादीशुदा महिला थी। बातें शुरू हुईं और उसने कहा, ''मैं तो गलत जगह फँस गई। मेरा पति गे है। अमरीका में रहता है। तलाक दे नहीं सकती। एक तलाकशुदा औरत से कौन शादी करेगा। मेरा भी अलग-अलग चीज़ों का मन होता है, बताओ क्या करूं।''
हम दोनों ने शराब पी। उसने हिंदी गाने लगाकर डांस करना शुरू किया। हम दोनों डाइनिंग रूम से बेडरूम गए।अब तक उसने मुझसे प्यार से बात की थी। काम जैसे ही खत्म हुआ , पैसे देकर बोली, "चल कट ले, निकल यहां से।''उसने मुझे टिप भी दी। मैंने उससे कहा, "मैं ये सब पैसों की मजबूरी की वजह से कर रहा हूं।"उसने कहा, ''तेरी मजबूरी को तेरा शौक बना दूंगी।''मेरी मजबूरी जो कोलकाता से सैकड़ों किलोमीटर दूर मेरे घर से शुरू हुई थीं।मेरी लोअर मिडिल क्लास फैमिली को मैं अनलकी लगता था क्योंकि मेरे जन्म के बाद ही पिता की नौकरी चली गई। वक्त के साथ ये दूरियां बढ़ती गईं। मेरा सपना एमबीए करने का था लेकिन इंजीनियरिंग करने को मजबूर किया गया और नौकरी लगी कोलकाता में।ऑफिस में सब बांग्ला ही बोलते।
भाषा और ऑफिस पॉलिटिक्स की वजह से मैं परेशान रहने लगा। शिकायत भी की। लेकिन कुछ नहीं हुआ। बाथरूम जाकर रोता तो कार्ड के इन और आउट टाइम को नोट करके कहा जाता, 'ये सीट पर नहीं रहता।'मेरा आत्मविश्वास ख़त्म होने लगा था । धीरे-धीरे डिप्रेशन ने मुझे घेर लिया। डॉक्टर के पास भी गया लेकिन परेशानियां ख़त्म नहीं हुईं।ज़िम्मेदारियों और परेशानियों का गठ्ठर कंधों पर इतना भारी लगने लगा कि मैंने इंटरनेट पर सर्च करना शुरू किया। मुझे पैसे कमाने थे ताकि मैं एमबीए कर सकूं, घर पैसे भेज सकूं और कोलकाता की ये नौकरी छोड़कर भाग जाऊं।इस बीच मुझे इंटरनेट पर मेल एस्कॉर्ट यानी जिगोलो बनने का रास्ता दिखा। ऐसा फ़िल्मों में देखा था। कुछ वेबसाइट्स होती हैं जहां जिगोलो बनने के लिए प्रोफाइल बनाई जा सकती हैं। लेकिन ये कोई जॉब प्रोफाइल नहीं था।
प्रोफाइल लिखने में डर लग रहा था। पर मैं उस दहलीज़ पर खड़ा था, जहां से मेरे पास सिर्फ़ दो रास्ते बचे थे।
एक- दहलीज़ से पीछे हटकर सुसाइड कर लूं।
दूसरा- दहलीज़ के पार जाकर जिगोलो बन जाऊं।
मैंने दहलीज़ को लांघने का फ़ैसला कर लिया था।