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संबंध बनाते वक्त पति करता था ये हरकत, पत्नी ने तोड़ दिया रिश्ता

Fri, 13 Dec 2019 05:36 PM IST
निलेश कुमार बीबीसी हिंदी
बीबीसी हिंदी Published by: निलेश कुमार Updated Fri, 13 Dec 2019 05:36 PM IST
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story of sexual violence in bedroom with wife
relationship

मुझे ऐसा लग रहा था कि वो रात बीतेगी नहीं। मेरा सिर फट रहा था और मैं लगातार रोए जा रही थी। रोते-रोते जाने कब आंख लग गई। सुबह छह बजे नींद खुली तो मेरा पति सामने था। पिछली रात का सवाल लिए। उसने पूछा, "तो क्या सोचा तुमने? तुम्हारा जवाब हां है या ना? "मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था। आखिर हिम्मत करके बोली, "आप आज ऑफिस जाइए प्लीज। मैं आपको शाम तक फोन करके बता दूंगी, वादा करती हूं।"



उसने धमकाते हुए कहा, "ठीक है। मैं चार बजे खुद तुम्हें फोन करूंगा। मुझे जवाब चाहिए और हां, में जवाब चाहिए, वर्ना रात में सजा भुगतने के लिए तैयार रहना। "सजा से उसका मतलब था 'एनल सेक्स'। उसे पता था कि मुझे इससे बहुत दर्द होता है, इसीलिए उसने इसे 'टॉर्चर' करने का तरीका बना लिया था। नौ बजे तक वो और उसकी बड़ी बहन दोनों ऑफिस जा चुके थे। मैं घर में अकेली थी। घंटों सोचने के बाद मैंने अपने पापा को फोन लगाया और कहा कि मैं अब उसके साथ नहीं रह सकती।



 

story of sexual violence in bedroom with wife
relationship

मुझे डर था कि पापा नाराज होंगे लेकिन उन्होंने कहा, "तुम बैग उठाओ और निकलो वहां से।" मैं अपने 'ओरिजिनल सर्टिफिकेट्स' और एक किताब लेकर बस अड्डे की तरफ भागी। पति को मेसेज किया कि, 'मेरा जवाब ना है, मैं अपने घर जा रही हूं', और फोन स्विच ऑफ कर लिया। थोड़ी देर बाद मैं अपनों के बीच अपने घर थी। मैंने शादी के दो महीने में ही अपने पति का घर छोड़ दिया था। मेरा पति, साहिल, जिसे मैं आज से तकरीबन तीन साल पहले ग्रैजुएजशन के आखिरी साल में मिली।

वो बहुत हंसमुख था। मुझे उसका आस-पास रहना अच्छा लगता था और यूं ही आस-पास रहते हुए प्यार हो गया। हम घूमने जाते, घंटों फोन पर बातें करते। जिंदगी कुछ ज़्यादा ही मेहरबान थी, लेकिन ये गुलाबी रोमांस ज़्यादा दिन नहीं टिक सका।  धीरे-धीरे मुझे लगने लगा कि ये वो बराबरी वाला रिश्ता नहीं है, जो मैं चाहती थी। ये रिश्ता वैसा ही होता जा रहा था जैसा मेरे मम्मी और पापा का था। फर्क इतना कि मम्मी कुछ नहीं कहती थीं और मैं चुप रह नहीं पाती थी। पापा छोटी-छोटी बातों को लेकर मम्मी पर चीखते, हाथ उठाते। मम्मी बस रोती रहतीं। साहिल के साथ बहस होती तो वो अक़्सर धक्का-मुक्की पर उतर आता और जबरदस्ती करीब आने की कोशिश करता। मैं मना करती तो चीखता चिल्लाता।

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relationship

एक बार उसने मुझसे पूछा, "अच्छा बताओ, अगर मैं कभी तुम पर हाथ उठाऊं तो...?" मैं हैरान रह गई। बमुश्किल अपने गुस्से को काबू में कर बोली, "मैं उसी दिन तुमसे अलग हो जाऊंगी।" उसने तपाक से कहा, "इसका मतलब तुम मुझसे प्यार ही नहीं करती। प्यार में तो कोई शर्त नहीं होनी चाहिए।" इसके बाद तकरीबन एक महीने तक हमारी बोलचाल बंद रही। धीरे-धीरे लड़ाइयां बढ़ने लगीं। कई बार मैंने रिश्ता खत्म करने की कोशिश की लेकिन हर बार वो माफी मांग लेता था।

मैं इतनी परेशान हो गई कि आखिर मैंने शादी के लिए हामी भर दी। मैं तैयार तब भी नहीं थी और साहिल का वादा, कि वो कोई ऐसा काम नहीं करेगा जिससे मुझे दुख हो, पर भरोसा भी नहीं था। शादी के बाद मेरा डर सच बनकर सामने आने लगा। साहिल मुझे कठपुतली की तरह अपने इशारों पर नचाने लगा। मुझे कविताएं लिखने का शौक था। मैं फेसबुक पर अपनी कविताएं शेयर करती थी। उसने इस पर रोक लगा दी। मैं वही कपड़े पहन सकती थी जो वो चाहता था। मुझे याद है एक बार उसने कहा था, "रात तक अपनी पढ़ाई-लिखाई का काम निबटाकर बैठा करो। मुझे खुश नहीं रखोगी तो मैं कहीं और जाऊंगा।"

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वो कहता था कि मैं उसे खुश नहीं कर पाती हूं इसलिए पॉर्न देखकर कुछ सीखने की नसीहत देता और फिर उसके सिर पर हीरो बनने का शौक सवार हो गया। वो मुझे छोड़कर मुंबई जाना चाहता था।उसने कहा, "तुम यहीं रहकर नौकरी करो और मुझे पैसे भेजना। फिर मैं तुम्हारे नाम पर लोन लेकर घर भी खरीदूंगा।"

इसी के लिए उसे मेरी हामी चाहिए थी। उस रात 'हां' सुनने के लिए उसने मुझे धक्का देकर बेड पर गिरा दिया और फिर जबरदस्ती करने की कोशिश की। बस एक हद पार हो गई। उसी रात की अगली सुबह मैंने अपने पति को छोड़ दिया। मैं पढ़ी-लिखी लड़की थी, खुद कमा सकती थी, अपने दम पर जी सकती थी। फिर भी जब मैं साहिल का घर छोड़कर निकली तो लगा जैसे मेरा कलेजा मुंह को आ रहा था।

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समाज का डर था और अपनों का भी लेकिन मेरे सीने में जमा दर्द इस डर से ज्यादा बड़ा था। मम्मी-पापा और दो बहनों से घिरी मैं अपने घर पहुंची। मेरे बाल बिखरे हुए थे और आंखें रात भर रोने की वजह से सूजी हुई। शादी के दो महीने बाद लड़कियां जब मायके आती हैं तो उनके चेहरे पर अलग ही निखार होता है लेकिन मेरा चेहरा मुर्झाया हुआ था। पड़ोसियों की चतुर आंखों को सच्चाई भांपते देर नहीं लगी।

मेरे घर आने वालों का तांता लग गया। सब कह रहे थे, हमारे साथ बहुत बुरा हुआ। कुछ लोग उम्मीद बंधा रहे थे कि साहिल खुद मुझे वापस ले जाने आएगा। कुछ का कहना था कि इतनी छोटी-छोटी वजह से इतना बड़ा फैसला नहीं लेना चाहिए। जितने मुंह, उतनी बातें। लेकिन ये बातें मेरा फैसला नहीं बदल सकीं। साहिल का घर छोड़े मुझे सात महीने हो चुके हैं और अब मैं अपने रास्ते खुद तय कर रही हूं।

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