लोग अक्सर दूसरे देश के लोगों के बारे में बड़ी आसानी से कोई भी धारणा बना लेते हैं। जैसे, अमरीकियों को ढीठ और बिंदास कहा जाता है। इसी तरह के फ्रेंच लोगों को रूमानी और अक्खड़ माना जाता है। वहीं अंग्रेजों के बारे में कहा जाता है कि वो रूखे मिजाज के होते हैं और अपने भाव खुलकर जाहिर नहीं करते।तकलीफ चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो, अंग्रेज, सबके सामने रोना पसंद नहीं करते। लोग मानते हैं कि आम तौर पर अंग्रेज रिजर्व रहते हैं। खुलकर बातें नहीं करते।
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शेयर कीजिए अपनी फीलिंग्स, अपने जज्बातों को दबाना अच्छी बात नहीं
Thu, 03 Dec 2020 11:19 AM IST
मंजू ममगाईं
बीबीसी हिंदी/ लिंडा गेड्स
बीबीसी हिंदी/ लिंडा गेड्स
Published by: मंजू ममगाईं
Updated Thu, 03 Dec 2020 11:19 AM IST
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ब्रिटेन की क्वीन मैरी यूनिवर्सिटी के थॉमस डिक्सन ने एक दिलचस्प किताब लिखी है। इसका नाम है ''वीपिंग ब्रिटैनिका''। वो क्वीन मैरी यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर द हिस्ट्री ऑफ इमोशन्स के निदेशक हैं। डिक्सन बताते हैं कि ब्रिटेन के लोगों के रूखे होने के बारे में जो धारणा बनी है वो असल में 1870 से लेकर 1945 के दौर की थी। उस दौर में ब्रिटिश साम्राज्य अपने उरूज पर था।पब्लिक स्कूल में पढ़े-लिखे लोग, साम्राज्यवादी ताकत से लैस अंग्रेज, पूरी दुनिया पर राज कर रहे थे। ऐसे में अगर वो खुलकर एहसास का इजहार करते तो लोग उनकी बहादुरी को बनावटी मानते। इसलिए वो बाकी दुनिया से बड़ी रुखाई से पेश आते थे।
थॉमस डिक्सन कहते हैं कि उस दौर से पहले अंग्रेज खुलकर अपने एहसास बयां करते थे। महारानी विक्टोरिया के दौर में जब ये रूखे मिजाज के होने का आरोप अंग्रेजों पर चस्पां हुआ, उस वक्त भी अंग्रेज बहुत जज्बाती हुआ करते थे। मशहूर लेखक चार्ल्स डिकेंस की ही मिसाल ले लीजिए। उन्होंने अपने तमाम किरदारों के जज्बात खुलकर बयां किए हैं। या फिर खुद महारानी विक्टोरिया को ही लीजिए। 1837 में जब जनता उनकी ताजपोशी का जश्न मना रही थी, तो खुशी से उनके आंसू छलक पड़े थे।
थॉमस डिक्सन कहते हैं कि उस दौर से पहले अंग्रेज खुलकर अपने एहसास बयां करते थे। महारानी विक्टोरिया के दौर में जब ये रूखे मिजाज के होने का आरोप अंग्रेजों पर चस्पां हुआ, उस वक्त भी अंग्रेज बहुत जज्बाती हुआ करते थे। मशहूर लेखक चार्ल्स डिकेंस की ही मिसाल ले लीजिए। उन्होंने अपने तमाम किरदारों के जज्बात खुलकर बयां किए हैं। या फिर खुद महारानी विक्टोरिया को ही लीजिए। 1837 में जब जनता उनकी ताजपोशी का जश्न मना रही थी, तो खुशी से उनके आंसू छलक पड़े थे।
थॉमस डिक्सन कहते हैं कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद अंग्रेजों का रूखा मिजाज बदलने लगा था। उन्नीस सौ साठ का दशक आते आते टीवी पर एगोनी आंटी नाम के किरदार तो अंग्रेजों को इस बात का हौसला दे रहे थे कि वो अपने जज्बात खुलकर बयां करें। तब से दौर और भी बदल चुका है। मगर अंग्रेजों के रूखे होने की जो इमेज बनी, वो कभी भी बदल नहीं सकी।
डिक्सन कहते हैं कि आज ब्रिटेन में तमाम टीवी चैनल्स पर रोने-धोने वाले सीरियल आते हैं। उन्हें देख-देखकर लोगों की आंसुओं की धार बह चलती है। फिर भी अंग्रेज यही सुनना पसंद करते हैं कि वो रूखे मिजाज के हैं। असल में ये इमेज उनके सबसे बेहतरीन दौर से जुड़ी है। उस दौर की याद दिलाती है। लोग उसी में खोए रहना चाहते हैं।
डिक्सन कहते हैं कि आज ब्रिटेन में तमाम टीवी चैनल्स पर रोने-धोने वाले सीरियल आते हैं। उन्हें देख-देखकर लोगों की आंसुओं की धार बह चलती है। फिर भी अंग्रेज यही सुनना पसंद करते हैं कि वो रूखे मिजाज के हैं। असल में ये इमेज उनके सबसे बेहतरीन दौर से जुड़ी है। उस दौर की याद दिलाती है। लोग उसी में खोए रहना चाहते हैं।
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कई लोग, ऐसे हालात टालते हैं जिसमें उनके जज्बात बाहर आ जाएं। कुछ लोग हालात को ही बदलने की कोशिश करते हैं। कुछ लोग अपना ध्यान उस जगह से हटा लेते हैं, जहां पर उनके भावुक होने का डर होता है। और फिर जब हालात बदल जाते हैं तो वो लोग उसे नए नजरिए से देखने की कोशिश करते हैं। या फिर बहुत से लोग अपने एहसास को जाहिर ही नहीं होने देते। अपने दिल के भीतर दबाकर रखते हैं। आम तौर पर ये कहा जाता है कि अगर आप अपने एहसासों पर इस तरह काबू पान लेते हैं तो अच्छी बात है। इससे आपकी दिमागी सेहत ठीक रहती है। उम्र बढ़ती है। आप करियर में भी काफी कामयाब होते हैं।
मगर, मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि जज्बातों को दबाना अच्छी बात नहीं। मान लीजिए कि आपके सालान एप्रेजल के वक्त आपका बॉस आपके बारे में खराब बातें कहता है। आपको बुरा लगता है मगर आप चुप रह जाते हैं। तो ये अच्छी बात कैसे हो सकती है?
मगर, मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि जज्बातों को दबाना अच्छी बात नहीं। मान लीजिए कि आपके सालान एप्रेजल के वक्त आपका बॉस आपके बारे में खराब बातें कहता है। आपको बुरा लगता है मगर आप चुप रह जाते हैं। तो ये अच्छी बात कैसे हो सकती है?
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कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी की सुजैन श्वीजर कहती हैं कि अपने एहसासों को दबाना ठीक उसी तरह है जैसे आप किसी ख़याल को दबाते हैं। मान लिया एक बार आप अपने जज्बात दबाने में कामयाब हो गए। तो, अगली बार वो दोगुनी ताकत से आपको परेशान करेगा।तमाम रिसर्च से ये बात सामने आई है कि अपने जज्बातों को दबाने की आपको भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है। स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के जेम्स ग्रॉस ने इस बारे में एक तजुर्बा किया। उन्होंने कुछ लोगों को एक भयानक फिल्म दिखाई। उन्हें कहा गया कि फिल्म देखने के दौरान वो अपने मनोभाव जाहिर न होने दें। उन्हें दबा दें। इसी तरह कुछ लोगों को हंसी-मजाक वाली फिल्म दिखाई गई और उन्हें भी चुप रहकर फिल्म देखने को कहा गया।
ग्रॉस बताते हैं हंसी मजाक वाली फिल्म देखने वालों को जरा भी अच्छा नहीं महसूस हुआ। जबकि हल्की फुल्की फिल्म देखने के बाद उन्हें इस तरह का एहसास होना चाहिए था। वो अपने अच्छे जज्बात दबा रहे थे। इससे उनके अंदर नेगेटिव फीलिंग आ गई।
ग्रॉस बताते हैं हंसी मजाक वाली फिल्म देखने वालों को जरा भी अच्छा नहीं महसूस हुआ। जबकि हल्की फुल्की फिल्म देखने के बाद उन्हें इस तरह का एहसास होना चाहिए था। वो अपने अच्छे जज्बात दबा रहे थे। इससे उनके अंदर नेगेटिव फीलिंग आ गई।