जमाखोरी जुर्म है।इसे करने पर लोगों को कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ता है लेकिन, क्या आप को पता है कि डिजिटल हो रही दुनिया में डिजिटल जमाखोरी भी हो रही है।ऐसा करने वालों को इसकी भारी कीमत भी चुकानी पड़ रही है।फिलहाल, डिजिटल जमाखोरी को रोकने के लिए कानून तो नहीं हैं।लेकिन, ऐसा करने वाले अपने लिए मुसीबतों का ढेर लगा रहे हैं।हो सकता है कि आप भी डिजिटल जमाखोरी कर रहे हों।चलिए इसका पता लगाते हैं।क्या आप के मोबाइल में तस्वीरों का अंबार लगा है? क्या आप के पर्सनल और ऑफिशियल ई-मेल अकाउंट में हजारों मेल जमा हैं? क्या आप के पेन ड्राइव में ढेर सारे गैरजरूरी डॉक्यूमेंट सेव हैं?
आपके फोन में मौजूद तस्वीरें बन सकती हैं आपके लिए मुसीबत,जानें कैसे
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अगर इन सभी सवालों का जवाब हां है, तो आप भी डिजिटल जमाखोरी कर रहे हैं।आज हमारे मोबाइल, लैपटॉप और कंप्यूटर की स्टोरेज लगातार बढ़ती जा रही है।इसके अलावा तमाम कंपनियां अपनी क्लाउड स्टोरेज सुविधाएं मुफ़्त में या बेहद मामूली दर पर दे रही हैं।नतीजा ये कि हम जरूरी डेटा के साथ-साथ हजारों गैरजरूरी 'बाइट्स' अपने मोबाइल, लैपटॉप या कंप्यूटर में जमा करते जा रहे हैं।ई-मेल, फोटो, डॉक्यूमेंट और दूसरे तरह की डिजिटल डेटा के पहाड़ हमें चारों तरफ से घेर चुके हैं।
डेटा के ढेर बन रहे मुसीबत
आज दुनिया में ये डिजिटल जमाखोरी इस कदर बढ़ गई है कि अब ये बाकायदा रिसर्च का विषय बन गयी है।हम अपने काम के दौरान या फिर निजी इस्तेमाल के दौरान तमाम ऐसे डेटा को जमा करते जा रहे हैं, जिनकी शायद हमें कभी जरूरत ही न पड़े पर, इस डिजिटल जमाखोरी के नतीजे खतरनाक हो सकते हैं।ये डिजिटल जमाखोरी हमें तनाव देती है।इससे घिरे हुए कई बार हम धुनते हैं।
हो सकता है कि दफ़्तर के ई-मेल में हजारों मेल देखकर आपका दिल अपने बाल नोचने का करता हो।हर रोज आप इस ढेर को साफ करने की सोच कर काम शुरू करते हैं, फिर मेल का जखीरा देख कर आप इसे अगली बार पर टाल देते हों। ये ई-मेल और दूसरे डिजिटल डेटा का ढेर आपके लिए मुसीबत बनता जा रहा है।
आपकी दिमागी सेहत पर असर डाल रहा है।बहुत से लोगों की आदत होती है कि काम होने के बाद भी मेल डिलीट नहीं करते।डॉक्यूमेंट बचाकर रखते हैं।तस्वीरें सहेजते रहते हैं।इस उम्मीद में कि आगे चल शायद इनकी कभी जरूरत पड़े।नतीजा ये कि जब जरूरत पड़ती है, तो हम डिजिटल कचरे के ढेर के नीचे ख़ुद को दबाते जा रहे हैं।
डिजिटल जमाखोरी पर रिसर्च पेपर
डिजिटल जमाखोरी जुमले का इस्तेमाल सबसे पहले साल 2015 में एक रिसर्च पेपर में हुआ था।नीदरलैंड के वैज्ञानिकों ने वहां के एक आदमी के बारे में लिखा था कि वो हर रोज हजारों तस्वीरें खींचता था फिर घंटों उन तस्वीरों की प्रोसेसिंग का काम करता था।अखबार ने लिखा था कि, 'वो आदमी अपनी खींची तस्वीरों को दोबारा देखता भी नहीं था।लेकिन उसे ये लगता था कि भविष्य में ये तस्वीरें किसी न किसी काम जरूर आएंगी।'डिजिटल जमाखोरी को कुछ इस तरह से परिभाषित किया गया है, 'डिजिटल फाइलों का ढेर इस कदर लगाते जाना कि उन्हें सहेजने का मकसद ही कहीं गुम हो जाए।'