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न पिकनिक न कहीं घूमना-फिरना, कोरोना वायरस लॉकडाउन ने ऐसे बदल दिए वीकेंड के मायने

Sat, 02 May 2020 11:30 AM IST
निलेश कुमार बीबीसी हिंदी
बीबीसी हिंदी Published by: निलेश कुमार Updated Sat, 02 May 2020 11:30 AM IST
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How Coronavirus lockdown change weekend program and covid 19 effects our lifestyle
जिंदगी में काम के साथ सुकून भी जरूरी है

जिंदगी में काम के साथ-साथ आराम और सुकून भी बेहद जरूरी है - खासकर जब माहौल इतना तनावपूर्ण हो। कोरोनावायरस के कारण लॉक डाउन में रहते हुए भी क्या हम अपने वीकेंड में ये आराम और सुकून के पल हासिल कर सकते हैं? ब्रिटिश धारावाहिक डाउन टाउन एबे में एक दृश्य है जब जमींदार क्रॉले परिवार के शानदार रात्रिभोज में एक मेहमान बताता है कि वह अपने जॉब के अलावा बाकी काम वीकेंड में कर सकता है। इस पर परिवार की बुजुर्ग वायलेट क्रॉले (अभिनेत्री मैगी स्मिथ) हैरान होकर पूछती है कि आखिर वीकेंड होता क्या है?



आज हममें से कई लोग यही सवाल पूछ रहे हैं, क्योंकि कोरोना वायरस के संक्रमण के डर से अनिवार्य सेवाओं को छोडकर सभी संस्थान, स्कूल, ऑफिस और हर तरह के सार्वजनिक स्थल बंद हैं। अपने-अपने घरों में कैद और अपने रूटीन से वंचित लोगों के लिए अब समय एक अनंत विस्तार है जिसे कैलेंडर की तारीखों और दिनों से परिभाषित नहीं किया जा सकता।

  • अपने घर के कपड़ों में टीवी देखते हुए और लैपटाप पर काम करते हुए क्या सचमुच कोई फर्क पड़ता है कि समय क्या है?
  • वर्क फ्राम होम और बच्चों की जरूरतों के बीच तालमेल बिठाते पता ही नहीं चलता कि सोमवार है या रविवार?
  • लगता ही नहीं कि वीकेंड का कोई अर्थ भी है और क्या इस क्वारंटीन दुनिया में वीकेंड का सुकून महसूस करना मुमकिन भी है?
How Coronavirus lockdown change weekend program and covid 19 effects our lifestyle
लोगों को अपनी दिनचर्या में रचनात्मक तरीके ढूंढने हैं

वीकेंड क्या होता है?
येल यूनिवर्सिटी में मनोविज्ञान के प्रोफेसर लॉरी सांटोस कहते हैं, "चुनौती यह है कि हमारे ज्यादातर शेड्यूल गड़बड़ा गए हैं। इंसान अपनी आदतों से बंधे होते हैं, इसलिए अपने काम के समय और आराम के समय के लिए एक दिनचर्या तय करने से अनिश्चितिता के माहौल में कमी आती है"।

आम दिनों में हमारी दिनचर्या बाहरी वजहों से नियंत्रित होती हैं, जैसे- स्कूल का समय, काम से जुड़ी बैठकें और अपॉइंटमेंट वगैरह। इन सब के बिना दुनिया भर में लोगों को नियमित कामकाज और आराम के लिए अलग-अलग समय तय करने के रचनात्मक तरीके ढूंढने हैं।

ट्रैवल कंपनी रिक स्टीव्स यूरोप की मार्केटिंग डायरेक्टर चेने कोरोनियोटिस आजकल घर से काम कर रही हैं, लेकिन अब भी वह अलार्म लगा कर ही सोती हैं और अपने नियमित समय पर काम शुरू कर देती हैं। देर तक सोने का आनंद वह सप्ताहांत में ही उठाती हैं।

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वीकेंड पर पिकनिक पर जाना फिलहाल संभव नहीं - फोटो : Pixabay

बच्चों वाले परिवारों में तो सप्ताह के किसी भी दिन सुबह देर से नहीं उठा जा सकता। पेरिस की एमिली सेफटेल एक अंतर्राष्ट्रीय संस्था के प्रशासनिक विभाग में काम करती हैं, उनके पति तकनीकी के क्षेत्र में हैं, उनका बेटा 6 साल का है और पति-पत्नी को इन दिनों घर पर अपने-अपने ऑफिस के काम और बेटे की स्कूलिंग का भी ध्यान रखना होता है।

अपने वीकेंड का आनंद उठाने के लिए दोनों ने एक नियम बनाया है: वीकेंड के हर दिन पति और पत्नी दोनों को अलग-अलग 3-3 घंटे सुकून के मिलेंगे, जिसे वे घर के किसी भी कोने में अपने हिसाब से बिता सकेंगे, उस दौरान उन्हें कोई तंग नहीं करेगा।

सेफटेल कहती हैं, "हम सुबह और दोपहर को एक-दूसरे को छुट्टी देते हैं। एक सुबह और दूसरे दिन की दोपहर एक को और पहले दिन की दोपहर और दूसरे दिन की सुबह दूसरे को। पिछले वीकेंड बाल्कनी में किताबें पढ़ने और अपना कमरा बंद कर नेट्फ्लिक्स देखने यानि जो चाहूं सो करने के लिए मुझे शनिवार की सुबह और रविवार की दोपहर को छुट्टी मिली थी"।

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay

मानव निर्मित हैं वीकेंड की छुट्टियां
दिन-रात होने या वर्ष बदलने के पीछे एक वैज्ञानिक वजह है। धरती के अपनी धुरी पर 24 घंटे में एक चक्कर लगाने से दिन और धरती के ही सूरज के चारों ओर चक्कर लगाने से वर्ष बदलते हैं। लेकिन जैसा कि पत्रकार कैटरीना ऑनस्टेड ने अपनी किताब 'द वीकेंड एफेक्ट: द लाइफ चेंजिंग बेनिफिट ऑफ टेकिंग टाइम ऑफ एंड चैलेंजिंग द कल्ट ऑफ ओवर वर्क' में जिक्र किया है, "वीकेंड का पूरा विचार ही मानव-समाज की देन है"।

वे कहती हैं, "दो दिन का वीकेंड तो 1930 की आर्थिक मंदी के दौरान ही पूरी तरह अपनाया गया। उस समय जिन उद्योगों ने तब तक सप्ताह में 40 घंटे काम की नीति नहीं अपनाई थी, उन्होंने कर्मचारियों के लिए सप्ताह में पांच दिन काम का शेड्यूल तय किया ताकि ज्यादा कर्मचारियों में कम काम के घंटे बांटे जा सकें। 1938 तक तो सप्ताह में 40 घंटे काम के कानून ही बनने लगे'। मौजूदा संकट भी ऐसे दीर्घावधि परिवर्तनों को जन्म दे सकता है।

पोर्ट्समाउथ यूनिवर्सिटी में इतिहास के प्रोफेसर ब्रेड बीवन कहते हैं, "कोरोना वायरस के प्रसार से पहले से ही वर्क वीक (कामकाजी सप्ताह) का पारंपरिक ढांचा बादल रहा था"। वे रिमोट वर्किंग और स्व-रोजगार के मामलों और गिग इकोनोमी की नौकरियों में वृद्धि का उदाहरण देते हुए कहते हैं, "स्व-एकांतवास (सेल्फ -आइसोलेशन) से कर्मचारी अपने उत्पादकता चक्र (प्रोडक्टिविटी साइकिल), ब्रेक और दिनचर्या का निर्धारण अपने हिसाब से कर पा रहे हैं"।

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay

सामान्य माहौल बनाने के लिए जरूरी
अभी यह देखना बाकी है कि इस संकट के बाद समाज के आचार-व्यवहार में क्या बदलाव आते हैं। लेकिन इस दौरान निजी स्तर पर सप्ताह और दिन के ढांचे को किसी प्रकार का व्यवस्थित रूप देना बेहद जरूरी है ताकि हम इस अनिश्चितता और तनाव के माहौल से कुछ हद तक निपट सकें।

प्रोडक्टिविटी कंसल्टेंट और 'इंडिस्ट्रेक्टेबल: हाउ टु कंट्रोल योर अटेन्शन एंड चूज योर लाइफ" पुस्तक के लेखक नीर एयल कहते हैं, "अगर आप कुछ नहीं करना चाहते तो कोई बात नहीं, लेकिन अगर आप कुछ करना चाहते हैं, तो इसके सिवा कोई चारा नहीं है। हम एक नियमित दिनचर्या चाहते हैं और हम जानते हैं कि तय दिनचर्या के बिना लोग पागल हो सकते हैं। जिन हालात में लोगों का नियंत्रण कम होता है और अपेक्षाएं ज्यादा, वहां अवसाद और चिंता की समस्या बढ़ जाती हैं"।

एयल 2006 के एक अध्ययन का हवाला देते हैं जिससे पता चला कि जिन नौकरियों में लोगों का अपने कामकाज की स्थितियों पर नियंत्रण बहुत कम नियंत्रण है, सामाजिक सहायता का अभाव होता है और बहुत अधिक मनोवैज्ञानिक अपेक्षाएं रहती हैं, वहां अवसाद और चिंता जैसी मानसिक समस्याओं के होने की ज्यादा संभावना होती है"।

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