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पत्ता-गोभी की सब्जी यूं हो जाती है जानलेवा

Wed, 25 Jul 2018 10:31 AM IST
लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला
लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला Updated Wed, 25 Jul 2018 10:31 AM IST
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Know why eating cabbage is a threat to your health
माता-पिता के लिए समझ पाना बहुत मुश्किल था कि आखिर क्यों उनकी बेटी लगभग हर रोज सिर दर्द की शिकायत करती है। क्यों उसे रहते-रहते दौरे आने लगते हैं। लगभग 6 महीने से ऐसा चल रहा था, लेकिन जब इसकी वजह पता चली तो उन्हें यकीन नहीं हुआ। "बच्ची के दिमाग में 100 से ज़्यादा टेपवर्म यानी फीताकृमि के अंडे थे। जो दिमाग में छोटे-छोटे क्लॉट (थक्के) के रूप में नजर आ रहे थे।" गुड़गांव स्थित फोर्टिस अस्पताल में न्यूरोलॉजी डिपार्टमेंट के डायरेक्टर डॉ. प्रवीण गुप्ता की देखरेख में बच्ची का इलाज चल रहा है। डॉ. गुप्ता बताते हैं "हमारे पास आने से पहले वो इलाज करवा रही थी। उसे तेज सिर दर्द की शिकायत थी और दौरे पड़ते थे। वो दिमाग में सूजन और दौरे पड़ने का ही इलाज करवा रही थी।"
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बच्ची के दिमाग की सूजन कम करने के लिए लिए बच्ची को स्टेरॉएड्स दिया जाने लगा था। इसका असर ये हुआ कि आठ साल की बच्ची का वजन 40 किलो से बढ़कर 60 किलो हो गया। वजन बढ़ा तो और तकलीफ बढ़ गई। चलने-फिरने में दिक्कत आने लगी और सांस लेने में तकलीफ शुरू हो गई। वो पूरी तरह स्टेरॉएड्स पर निर्भर हो चुकी थी।
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बच्ची जब डॉ गुप्ता के पास आई तो उसका सिटी-स्कैन किया गया। जिसके बाद उसे न्यूरोसिस्टिसेरसोसिस से पीड़ित पाया गया। डॉक्टर गुप्ता बताते हैं "जिस समय बच्ची को अस्पताल लाया गया वो होश में नहीं थी। सिटी स्कैन में सफेद धब्बे दिमाग में नजर आए। ये धब्बे कुछ और नहीं बल्कि फीताकृमि के अंडे थे। वो भी एक या दो नहीं बल्कि सौ से ज़्यादा की संख्या में।"जब बच्ची डॉ. गुप्ता के पास पहुंची तो उसके दिमाग पर प्रेशर बहुत अधिक बढ़ चुका था। अंडों का प्रेशर दिमाग पर इस कदर हो चुका था कि उसके दिमाग ने काम करना बंद कर दिया था।
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पर दिमाग तक पहुंचे कैसे ये अंडे?

डॉ गुप्ता बताते हैं, "सबसे पहले तो हमने दवाइयों से उसके दिमाग का प्रेशर (दिमाग में कोई भी बाहरी चीज आ जाए तो इससे दिमाग का अंदरूनी संतुलन बिगड़ जाता है) कम किया। उसके बाद उसे सिस्ट मारने की दवा दी गई। ये काफी खतरनाक भी होता है क्योंकि इस दौरान दिमाग का प्रेशर बढ़ भी सकता है।"फिलहाल अंडों को खत्म करने की पहली ख़ुराक बच्ची को दी गई है, लेकिन अभी सारे अंडे खत्म नहीं हुए हैं। डॉ. गुप्ता बताते हैं दिमाग में ये अंडे लगातार बढ़ते रहते हैं। ये अंडे सूजन और दौरे का कारण बनते हैं। डॉ. गुप्ता बताते हैं कि कोई भी चीज जो अधपकी रह जाए तो उसे खाने से, साफ-सफाई नहीं रखने से टेपवर्म पेट में पहुंच जाते हैं। इसके बाद खून के प्रवाह के साथ ये शरीर के अलग-अलग हिस्सों में चले जाते हैं।"भारत में मिर्गी के दौरे की एक जो बड़ी परेशानी है उसका एक प्रमुख कारण टेपवर्म है। भारत में टेपवर्म का संक्रमण बहुत ही सामान्य है। करीब 12 लाख लोग न्यूरोसिस्टिसेरसोसिस से पीड़ित हैं, जो मिर्गी के दौरों का एक प्रमुख कारण है।"

 

टेपवर्म है क्या?

टेपवर्म एक तरह का पैरासाइट है। ये अपने पोषण के लिए दूसरों पर आश्रित रहने वाला जीव है। इसलिए ये शरीर के अंदर पाया जाता है, ताकि उसे खाना मिल सके। इसमें रीढ़ की हड्डी नहीं होती है। इसकी 5000 से ज़्यादा प्रजातियां पाई जाती हैं। ये एक मिमी से 15 मीटर तक लंबे हो सकते हैं। कई बार इसका सिर्फ एक ही आश्रय होता है तो कई बार एक से अधिक। इसका शरीर खंडों में बंटा होता है। इसके शरीर में हुक के जैसी संरचनाएं होती हैं जिससे ये अपने आश्रयदाता के अंग से चिपका रहता है।शरीर पर मौजूद क्यूटिकिल की मदद से यह अपना भोजन लेता है। यह पचा-पचाया भोजन ही लेते हैं क्योंकि इनमें पाचन-तंत्र नहीं होता है।

कैसे फैलता है ये?
टेपवर्म फ़्लैट, रिबन के जैसी संरचना वाले होते हैं। अगर फीताकृमि का अंडा शरीर में प्रवेश कर जाता है तो यह आंत में अपना घर बना लेता है। हालांकि जरूरी नहीं कि ये पूरे जीवनकाल आंत में ही रहे, खून के साथ ये शरीर के दूसरे हिस्सों में भी पहुंच जाता है।लीवर में पहुंचकर ये सिस्ट बना लेते हैं, जिससे पस हो जाता है। कई बार ये आंखों में भी आ जाते हैं और दिमाग में भी।

एशिया की तुलना में यूरोपीय देशों में इसका खतरा कम है। एनएचएस के अनुसार, अगर शरीर में टेपवर्म है तो जरूरी नहीं कि इसके कुछ लक्षण नजर ही आए, लेकिन कई बार ये शरीर के कुछ अति-संवेदनशील अंगों में पहुंच जाता है, जिससे खतरा हो सकता है।

हालांकि इसका इलाज भी आसान है। दिल्ली स्थित सर गंगाराम अस्पताल में गैस्ट्रोलॉजिस्ट डॉ. नरेश बंसल के अनुसार, भले ही टेपवर्म जानलेवा नहीं हैं, लेकिन इन्हें नजरअंदाज करना खतरनाक हो सकता है।डॉ. बंसल मानते हैं कि यूं तो टेपवर्म दुनिया भर में पाए जाते हैं और इनसे जुड़ी स्वास्थ्य समस्याएं भी लेकिन भारत में इसके संक्रमण से जुड़े मामले ज़्यादा सामने आते हैं।

 

टेपवर्म के कारण

- अधपका या कच्चा पोर्क या बीफ खाने से, अधपकी या कच्ची मछली के सेवन से। दरअसल, इन जीवों में टेपवर्म का लार्वा होता है। ऐसे में अगर इन्हें अच्छी तरह पका कर नहीं खाया जाए तो टेपवर्म शरीर में पहुंच जाते हैं।

दूषित पानी पीने से
पत्ता-गोभी, पालक को अगर अच्छी तरह पकाकर नहीं बनाया जाए तो भी टेपवर्म शरीर में पहुंच सकता है इसलिए गंदे पानी में या मिट्टी के संपर्क में उगने वाली सब्जियों को धो कर खाने की सलाह दी जाती है।

टेपवर्म संक्रमण के लक्षण
आमतौर पर इसका कोई बहुत सटीक लक्षण नजर नहीं आता है, लेकिन टेपवर्म शरीर में हों तो शौच से पता चल जाता है। इसके अलावा पेट में दर्द, डायरिया, कमजोरी और उल्टी, अनियमित भूख और कमजोरी इसके प्रमुख लक्षण हैं।
अगर शरीर में टेपवर्म की संख्या या अंडों की संख्या बहुत अधिक है तो चक्कर आना, त्वचा का पीलापन, खांसी, सांस फूलना, देखने में दिक्कत जैसी शिकायतें भी हो सकती हैं।

बचाव के उपाय
-टेपवर्म एकबार शरीर में पहुंच जाए तो इससे दवा की मदद से ही छुटकारा पाया जा सकता है लेकिन अगर कुछ सावधानियां बरती जाएं तो इसके संक्रमण से बचा जा सकता है।
-किसी भी किस्म के मांस को बिना अच्छी तरह पकाए न खाएं।
-फल-सब्जियों को खाने से पहले अच्छी तरह धो लें।
-खाना खाने से पहले हाथ जरूर धोएं। शौच के बाद हाथों और नाखूनों को अच्छी तरह साफ करें।
-हमेशा साफ पानी ही पिएं।
-मवेशियों के सीधे संपर्क से बचें या उस दौरान विशेष सावधानी रखें।
-डॉ. बंसल मानते हैं कि टेपवर्म जानलेवा नहीं है ये मानकर इसे लापरवाही में नहीं लेना चाहिए। ये शरीर के किसी ऐसे अंग में भी जा सकता है, जिससे शरीर का वो हिस्सा लकवाग्रस्त हो सकता है।
 
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