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बॉम्बे डक: मुंबई के पारसियों को खूब पसंद है यह मछली, अखिर क्या है इसमें खास?

Thu, 23 Apr 2020 02:20 PM IST
निलेश कुमार बीबीसी हिंदी
बीबीसी हिंदी Published by: निलेश कुमार Updated Thu, 23 Apr 2020 02:20 PM IST
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Indias brilliant Bombay duck is actually a fish, and the root of its curious name is a great mystery
बॉम्बे डक - फोटो : Social Media

अपने अनुभव की चर्चा करते हुए बीबीसी की रिपोर्ट में मेहर मिर्जा लिखती हैं- जब मैं छोटी थी तो बॉम्बे(अब मुंबई) में सबसे ज्यादा जून महीने का इंतजार करती थी। झुलसाने वाली गर्मी के बाद इस महीने में मॉनसून के बादल आते थे, बिजली चमकती थी और गर्मी दूर भागती थी। यही वह समय होता था जब मैं नई किताबों पर नई जिल्द चढ़ाकर दोबारा स्कूल जाती थी।



इन सबसे बढ़कर, इसी महीने में मुझ जैसे पारसियों के घर की रसोई में बॉम्बे डक आती थी। मॉनसून के महीने में ही यह सबसे ज्यादा मिलती है और इसे पकड़ना आसान होता है। लेकिन पारसी कौन हैं? और बॉम्बे डक क्या है? पारसी ईरान के जोरोस्ट्रियन प्रवासी हैं, जो 8वीं सदी से भारत में रह रहे हैं।

Indias brilliant Bombay duck is actually a fish, and the root of its curious name is a great mystery
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : social media

ईरान के प्रवासी
19वीं सदी के उपनिवेश काल में बॉम्बे में वे खूब फले-फूले। पारसी उद्यमियों ने अंग्रेजों की शोहबत में पश्चिमी शिक्षा और संवेदनाओं को अपनाया और भारतीय उद्योग और राजनीति में बड़े ओहदे हासिल किए। वे वाणिज्य-व्यापार की अहम शख्सियत बने और अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके गरीबों के लिए स्कूल, कॉलेज और अस्पताल बनवाए। 19वीं सदी में बॉम्बे में जोरोस्ट्रियन प्रवासियों की संख्या बढ़ी।

ये चतुर उद्यमी ईरानी थे, जिन्होंने बॉम्बे में ईरानी कैफे खोले, जहां पारंपरिक रूप से सभी जातियों, धर्मों और लिंग के लोगों को खाना खिलाया जाता है। भारत की तरह पारसी व्यंजनों पर उन सभी संस्कृतियों का प्रभाव पड़ा जिन्होंने इस उपमहाद्वीप में अपनी छाप छोड़ी है। इनका मूल संभवतः इस्लाम से पहले के ईरान में है, लेकिन इस पर गुजरात, गोवा और कोंकण तटों का भी असर है।

ब्रिटेन और यहां तक कि नीदरलैंड ने भी इस पर प्रभाव छोड़ा है। भारतीय समुद्र तटों, खासकर गुजरात के तटीय इलाकों की पारसी बस्तियों ने मछली को पारसी संस्कृति से जोड़ दिया है। हम अन्य मछलियों के साथ छामनो (पॉम्फ्रेट), बोई (मुलेट), कोल्मी (झींगा), लेवटी (मड हॉपर), भींग (शाद), रवास (भारतीय सालमन) और बांगड़ा (मैकेरेल) खाते हैं। और फिर बॉम्बे डक है।

Indias brilliant Bombay duck is actually a fish, and the root of its curious name is a great mystery
बॉम्बे डक - फोटो : Social Media

बत्तख नहीं, मछली
बॉम्बे डक असल में एक मछली है जो मुंबई और आसपास के समुद्र में मिलती है। गुलाबी जिलेटिन जैसी इस बदसूरत मछली को यह नाम कैसे मिला, यह रहस्य है। मराठी में इस मछली को बॉम्बिल कहा जाता है। अंग्रेज इसे बोलने के लिए अपनी जीभ को महाराष्ट्र के लोगों की तरह नहीं घुमा पाते होंगे। ऐसे में संभव है उन्होंने इसके नाम का अंग्रेजीकरण किया हो।

मराठी मछली बाजारों में इसे बेचने के लिए दुकानदार "बॉम्बिलतक" (बॉम्बिल यहां है) बोलते थे। हो सकता है कि उसका अंग्रेजीकरण किया गया हो। भारत में जन्मे ब्रिटिश-पारसी लेखक फारूक धोंडी ने अपनी किताब "बॉम्बे डक" में एक और वजह बताई है।

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बॉम्बे डक - फोटो : Social Media

उनका मानना है कि यह नाम ब्रिटेश मेल ट्रेनों से आया जो सूखी बॉम्बिल को मुंबई से देश के दूसरे शहरों तक ले जाती थीं। ट्रेन की बोगियों को "बॉम्बे डाक" कहा जाता था (डाक का मतलब होता है मेल)। इस मछली के लिए मुंबई की विभिन्न संस्कृतियों का प्यार बहुत गहराई तक है।

मुंबई के मूल वासियों में से एक, कोली मछुआरे सदियों से इसे नमक लगाकर धूप में सुखाते रहे हैं। वे इसके लिए बांस की कमानियों से बने बड़े-बड़े रैक का इस्तेमाल करते हैं जिनको वलैंडिस कहा जाता है। सूखी मछलियों से तेज बदबू आती है। इसीलिए अंग्रेजों ने इसे सेहत के लिए नुकसानदेह समझा था, मगर बाद में वे इसे पसंद करने लगे।

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया

कैसे पकाएं कैसे खाएं?
इन सूखी मछलियों को मॉनसून के दिनों में खाया जाता है। इसे करी में पकाया जाता है या फ्राई करके दाल-चावल के साथ खाया जाता है। कोली मछुआरे इसे ताजा भी खाते हैं। वे इसे तीखे कोली मसाले में लपेटकर तैयार करते हैं या आधी सूखी मछली (बम्बुक बॉम्बिल) को नारियल की ग्रेवी में पकाते हैं।

भारत के पश्चिमी कोंकण तट पर सीफूड पसंद करने वाले ज्यादातर समुदायों (जैसे पूर्वी भारतीय और मराठी) के खाने में बॉम्बे डक शामिल है। पूर्वी भारतीय इसे सिरके की चटनी में डालकर तलते हैं। इसे छोटी झींगा मछलियों के साथ भी पकाया जाता है।

महाराष्ट्र के कुछ समुदाय इसे भाजी की तरह तलते हैं। दूसरे समुदाय सूखी मछली को हरी सब्जी के साथ मिलाकर प्याज इमली के मसाले के साथ पकाते हैं। इतना तो साफ है कि बॉम्बे डक का संबंध सिर्फ पारसियों से नहीं है, लेकिन हमारे घरों में इसकी खास जगह है। इसने हमारी थाली तक और हमारे गीतों तक में जगह बनाई है। हमारी किताबों में और हमारे नामों में भी इसका असर है। बूमला (बॉम्बे डक के लिए पारसी शब्द) पारसियों में एक प्रचलित सरनेम है।

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