भगवान श्री गणेश का जन्म भाद्रपद मास में शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को हुआ था, इसलिए हर साल गणेश चतुर्थी के दिन भगवान गणेश भक्तों के घर आते हैं। भक्त बड़े धूमधाम से गणेश चतुर्थी के दिन बप्पा का जन्मदिन मनाते हैं। इस साल 10 सितंबर को गणेश चतुर्थी है। गणपति की प्रतिमा स्थापित करने के लिए पंडाल सज गए हैं। गणेश मंदिरों को भी सजा दिया गया है। गणपति जी के जन्म से लेकर उनके वाहन, भोग और माता पार्वती व भगवान शिव जी के साथ उनकी कई कथाएं प्रचलित हैं, जिसे बच्चों के साथ-साथ बड़े भी उत्सुकता से सुनते हैं। आपको ये तो पता होगा कि भगवान गणेश का धड़ एक बालक का और सिर गज का है यानी हाथी के बच्चे का। इसके पीछे की वजह भी जरूर पता होगी। लेकिन क्या आपको पता है कि गणपति जी का असली सिर यानि जन्म के समय उसके शरीर पर जो बालक वाला सिर था, वो कहां है?
Ganesh Chaturthi 2021: क्या आप जानते हैं कहां है भगवान गणेश का कटा हुआ सिर? यहां जानें कहां है स्थित
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गणेश जी का सिर भगवान शिव ने ही क्रोध में काट दिया था। हालांकि बाद में उनके धड़ में हाथी का सिर जोड़ दिया गया। लेकिन जिस सिर को भोलेनाथ ने काटा था, वो अब कहां हैं। दरअसल, शिव जी ने गणेश जी का सिर एक गुफा में रख दिया था। कहा जाता है कि आज भी गणेश जी का सिर उसी गुफा में मौजूद है। इस गुफा को पाताल भुवनेश्वर के नाम से जाना जाता है।
पाताल भुवनेश्वर गुफा कहां है
उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के गंगोलीहाट से 14 किलोमीटर की दूरी पर स्थित पाताल भुवनेश्वर गुफा मंदिर में गणपति जी का सिर रखा है। यहां उन्हें आदि गणेश के नाम से जाना जाता है। भुवनेश्वर गुफा रहस्य और सुंदरता का बेजोड़ मेल है। पौराणिक कथाओं के मुताबिक, इस गुफा की खोज त्रेता युग में राजा ऋतुपर्णा ने की थी। ये पहले इंसान थे, जिन्होने इस दिव्य गुफा की खोज की थी। हालांकि बाद में लोग इस गुफा को भूल गए। बाद में पांडवों ने द्वापर युग में इस गुफा की खोज की और यहां रहकर भगवान शिव की पूजा करने लगे। कलियुग में पाताल भुवनेश्वर गुफा की खोज आदि शंकराचार्य ने आठवीं सदी में की थी।
मान्यता है कि इस गुफा में मौजूद गणेश जी के सिर की रक्षा खुद भगवान शिव करते हैं। इस गुफा की बनावट ही ऐसी है, जिसे देख कर प्रतीत होता है कि गुफा की रक्षा के लिए शेषनाग ने इसे चारों तरफ से घेर रखा है। यहां गणेश की कटी शिला रूपी मूर्ति स्थापित है, उसके ठीक ऊपर 108 पंखुड़ियों वाला शिवाष्टक दल ब्रह्म कमल रूपी चट्टान है। इस ब्रह्म कमल से भगवान गणेश के शिला रूपी मस्तक पर दिव्य बूंद टपकती रहती है। कहा जाता है कि स्वयं भगवान शिव ने इस ब्रह्मकमल को यहां स्थापित किया था।
यह गुफा 90 फीट नीचे है। दर्शन के लिए काफी पतले रास्ते से होकर मंदिर में प्रवेश किया जा सकता है। गुफा के चट्टान की बनावट दिखने में 100 पैरों वाले ऐरावत हाथी की तरह लगती है। आगे बढ़ने पर फिर से चट्टानों की कलाकृति नागों के राजा अधिशेष को दर्शाती है। आगे चलने पर चमकीले पत्थर भगवान शिव जी के जटाओं को दर्शाते हैं। गुफा में 33 हजार देवी देवताओं की मूर्तियां भी हैं।