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डिजिटल डॉक्टर: टेस्ट रिपोर्ट को समझना हो या डॉक्टर की पर्ची पढ़ना, एआई की मदद ले रहे ज्यादातर लोग

Mon, 31 Aug 2026 05:27 PM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: अभिलाष श्रीवास्तव Updated Mon, 31 Aug 2026 05:27 PM IST
सार

एआई चैटबॉट अब लोगों को डॉक्टर की पर्ची, मेडिकल टेस्ट रिपोर्ट और बीमारी के लक्षण समझने में मदद कर रहा हैं। कई लोग लक्षण बताकर संभावित बीमारी का पता लगाने की कोशिश भी करते हैं

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People Are Using AI to Understand Medical Reports and Symptoms How AI Is Changing Healthcare
एआई से मेडिकल सलाह ले रहे हैं लोग - फोटो : Amarujala.com/AI

मौजूदा समय को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) का दौर माना जा रहा है, ये लोगों के जीने के तरीके को बदल रहा है। मेडिकल के क्षेत्र में भी एआई क्रांति कर रही है। फोन में मौजूद एआई चैटबॉट्स का लोग अब लगभग रोजाना ही इस्तेमाल कर रहे हैं। 



डॉक्टर की लिखावट समझ नहीं आ रही? ब्लड टेस्ट रिपोर्ट में लिखे मेडिकल शब्द डराने लगे हैं या शरीर में कोई अजीब लक्षण दिख रहा है, लोग इसे समझने के लिए चैट जीपीटी का इस्तेमाल कर रहे हैं। खास बात यह है कि कई लोग डॉक्टर के पास जाने से पहले ही अपने लक्षणों के आधार पर संभावित बीमारी का अंदाजा लगाने की कोशिश कर रहे हैं।

स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, यह सुविधाजनक जरूर लग सकता है। कुछ सेकंड में कठिन मेडिकल भाषा आसान शब्दों में समझ आ जाती है और कई बार उन सवालों के जवाब भी मिल जाते हैं जिन्हें डॉक्टर से पूछने में झिझक होती है। लेकिन यहां एक बड़ा सवाल भी खड़ा होता है, क्या एआई से मिली जानकारी को बीमारी का सही निदान मान लेना सुरक्षित है?

स्वास्थ्य विशषज्ञ कहते है, फीड डेटा के आधार पर एआई आपकी रिपोर्ट समझा सकता है, संभावित कारणों की जानकारी दे सकता है और यह भी बता सकता है कि किन लक्षणों पर डॉक्टर से मिलना जरूरी है। लेकिन वह डॉक्टर की जांच, मरीज की पूरी मेडिकल हिस्ट्री और शारीरिक परीक्षण की जगह नहीं ले सकता।

People Are Using AI to Understand Medical Reports and Symptoms How AI Is Changing Healthcare
हेल्थ रिपोर्ट समझने के लिए ले रहे एआई की मदद - फोटो : Adobe Stock Photo

25% लोग एआई की मदद से पता कर रहे बीमारी

हालिया रिपोर्ट से पता चलता है कि अमेरिका सहित दुनिया के कई देशों में ये चलन तेजी से बढ़ता जा रहा है।

अमेरिका के ‘यू रिसर्च सेंटर’ के 3,488 वयस्कों पर किए गए ताजा सर्वे में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि हर तीसरा व्यक्ति (करीब 34% अमेरिकी) किसी न किसी स्वास्थ्य या चिकित्सीय कारण से एआई चैटबॉट्स का इस्तेमाल कर रहे हैं। 
 

  • सर्वे के अनुसार, इनमें से करीब 25% लोग अपने लक्षणों के आधार पर खुद बीमारी का पता लगाने के लिए एआई टूल्स की मदद ले रहे हैं। 
  • दिलचस्प बात यह है कि चैटबॉट से स्वास्थ्य संबंधी सलाह लेने वाले 95% यूजर्स ने इसे उपयोगी पाया है। 
  • हालांकि, अपनी बेहद निजी मेडिकल हिस्ट्री और रिपोर्ट इन टूल्स के साथ शेयर करने को लेकर लोगों के मन में डेटा प्राइवेसी का डर भी बना हुआ है।
People Are Using AI to Understand Medical Reports and Symptoms How AI Is Changing Healthcare
एआई से मेडिकल मदद ले रहे हैं लोग - फोटो : Amarujala.com/AI

क्यों बढ़ रही है लोगों की एआई पर निर्भरता?

आंकड़ों के मुताबिक, महंगे अमेरिकी हेल्थकेयर सिस्टम और समय की कमी के चलते चैटबॉट्स आसान और सस्ते विकल्प के रूप में उभरे हैं। इससे बिना किसी अपॉइंटमेंट के कुछ ही सेकंड्स में स्वास्थ्य संबंधी सलाह मिल जाती है साथ ही  शरीर में दिखने वाले लक्षणों के आधार पर यह जानना भी आसान हो जाता है कि आपको क्या समस्या हो सकती है? महंगी डॉक्टर कंसल्टेशन फीस से बचने के लिए भी ऐसा किया जा रहा है। एआई ने डॉक्टर द्वारा सुझाए गए इलाज और दवाओं के बारे में विस्तार से जानना भी आसान बना दिया है।
 

  • डॉक्टर ने जो बीमारी बताई है, उसके बारे में आसान भाषा में जानकारी लेना।
  • खून या अन्य जांच रिपोर्ट के जटिल मेडिकल टर्म्स और नंबरों को समझना।
  • यौन स्वास्थ्य या मानसिक समस्याओं, जिन पर डॉक्टर से खुलकर बात करने में झिझक होती है।
  • यह तय करना कि समस्या इतनी गंभीर है या नहीं कि अस्पताल जाना पड़े।



कौन लोग कर रहे इसका इस्तेमाल

सर्वे के अनुसार, एआई से हेल्थ सलाह लेने वालों में युवा, शिक्षित और उच्च आय वर्ग के लोग सबसे आगे हैं। 18 से 49 वर्ष के युवा और 65 से अधिक उम्र वालों की तुलना में काफी आगे हैं। 4 साल की कॉलेज डिग्री रखने वाले ग्रेजुएट्स चैटबॉट्स का सबसे ज्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं। उच्च आय वर्ग के लोग इसे एक अतिरिक्त हेल्थ-असिस्टेंट की तरह उपयोग कर रहे हैं। जो लोग एआई को लेकर उत्साहित हैं, उनमें से 60% इसका उपयोग कर रहे हैं, जबकि आशंकित लोगों में यह आंकड़ा महज 21% है। खास बात यह है कि 95 फीसदी लोगों को मदद मिली, लेकिन डेटा चोरी का डर बरकरार है।



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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस के आधार पर तैयार किया गया है।

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।

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