भारत में महिलाएं क्यों निकलवा रही हैं गर्भाशय?
पहली घटना महाराष्ट्र की है जहां पिछले तीन साल में हज़ारों महिलाओं को गर्भाशय निकालने के लिए ऑपरेशन कराना पड़ा है. ये संख्या अच्छी खासी है. ऑपरेशन इसलिए कराना पड़ा ताकि उन्हें गन्ने के खेत में काम मिल सके। हर साल सोलापुर, सांगली, उस्मानाबाद, बीड़ जैसे ज़िलों से दसियों हज़ार ग़रीब परिवार पलायन कर राज्य के संपन्न पश्चिमी इलाक़े में आते हैं जहां उन्हें गन्ने के खेतों में छह महीने के लिए काम मिलता है। एक बार जब वो पहुंचते हैं, उसके बाद उनकी ज़िंदगी उन लालची ठेकेदारों के हाथ में होती है जो उनका शोषण करने का कोई मौका नहीं छोड़ते।
गन्ना कटाई का काम कड़ी मेहनत वाला होता है, इसलिए वे महिलाओं को काम देने के प्रति उदासीन होते हैं और दूसरा कारण ये भी है कि माहवारी के दिनों में महिलाएं एक या दो दिनों के लिए काम पर नहीं आती हैं।अगर उनसे एक दिन का काम भी छूट जाए तो उन्हें जुर्माना भरना पड़ता है। काम की जगह पर उनके रहने के हालात बहुत बुरे हैं, परिवारों को खेत के पास बनी झोपड़ी या टेंटों में रहना पड़ता है, जहां कोई टॉयलेट नहीं होता और चूंकि कभी कभी रात में भी गन्ने की कटाई होती है तो उनके सोने उठने का भी कोई निश्चित समय नहीं होता है। और जब महिलाएं माहवारी में होती हैं, ये उनके लिए और कठिन हो जाता है। साफ़ सफ़ाई की बहुत अच्छी स्थिति न होने के कारण अधिकांश महिलाओं को संक्रमण हो जाता है. इन इलाकों में काम करने वाले समाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि ये महिलाएं डॉक्टर के पास जाती हैं तो वे लालची डॉक्टर ग़ैरज़रूरी ऑपरेशन करवाने के लिए कहते हैं, भले ही वो दिक्कत दवा से ठीक हो सकती हो।
इन इलाकों में अधिकांश महिलाओं की कम उम्र में ही शादी हो जाती है, इसलिए 20 से 30 साल की उम्र तक आते आते ये दो या तीन बच्चों की मां बन चुकी होती हैं। चूंकि डॉक्टर उन्हें गर्भाशय निकलवाने के ऑपरेशन से जुड़ी समस्याओं के बारे में नहीं बताते इसलिए उनमें से अधिकांश महिलाएं मानती हैं कि गर्भाशय से छुटकारा पाना ही ठीक है। इसकी वजह से इन इलाक़ों में अधिकांश गांव तो "गर्भाशय विहीन महिलाओं के गांव" में तब्दील हो गए हैं। गांव जहां 90 फीसदी महिलाओं के गर्भाशय हटा दिए गए
जब पिछले महीने महाराष्ट्र के विधानसभा में विधायक निलम गोरहे ने इस बारे में सवाल उठाया तो राज्य के स्वास्थ्य मंत्री एकनाथ शिंदे ने स्वीकार किया कि बीते तीन साल में केवल बीड़ में 4,605 महिलाओं के गर्भाशय निकाले गए हैं। हालांकि उन्होंने कहा कि ये सारे मामले सिर्फ गन्ने के खेत में काम करने वाली महिलाओं से ही संबंधित नहीं है। मंत्री ने कहा कि बहुत से मामलों की जांच के लिए एक कमेटी गठित की गई थी. बीड़ के गांव वंजारवाड़ी का दौरा किया करने वाली बीबीसी मराठी की मेरी सहयोगी प्रजाक्ता धुलप कहती हैं कि हर साल अक्टूबर से मार्च के बीच 80 प्रतिशत ग्रामीण गन्ने के खेतों में काम करने के लिए पलायन कर जाते हैं।