15 से 20 साल की उम्र को आमतौर पर ऐसी उम्र माना जाता है, जब शरीर मजबूत होता है और बीमारियां दूर रहती हैं। लेकिन इस दौरान माता-पिता को बच्चों-किशोरों की सेहत को लेकर सबसे ज्यादा अलर्ट रहने की भी जरूरत होती है। किशोरावस्था में शरीर में तेजी से बदलाव आ रहा होता है। इसी दौरान कई ऐसी बीमारियां सामने आ सकती हैं, जिन्हें अक्सर लोग पढ़ाई का तनाव, कमजोरी या मौसम बदलने की वजह मानकर टाल देते हैं।
सेहत की बात: पढ़ाई की उम्र में बीमारियों की मार झेल रहे हैं किशोर, सभी माता-पिता दें ध्यान
15 से 20 साल की उम्र में भी एनीमिया, अस्थमा, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर से लेकर थायरॉयड जैसी समस्याएं भी हो सकती हैं। लगातार थकान, सांस फूलने, ज्यादा प्यास लगने, बार-बार सिरदर्द या कमजोरी जैसे संकेतों को सामान्य मानकर टालना सही नहीं है।
किशोरों की स्वास्थ्य समस्याएं
स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, 15 से 20 साल की उम्र में शरीर सबसे तेजी से बदलावों का सामना कर रहा होता है, इसलिए हर लक्षण को बीमारी मानना सही नहीं है। लेकिन बार-बार होने वाले या बढ़ते लक्षणों को नजरअंदाज भी नहीं करना चाहिए है। समय पर जांच से कई बीमारियों की पहचान शुरुआती स्तर पर हो सकती है और किसी बड़े खतरे से बचा जा सकता है।
किशोरों में एनीमिया यानी खून में हीमोग्लोबिन की कमी एक महत्वपूर्ण समस्या है।
- खासकर लड़कियों में मासिक धर्म के दौरान ज्यादा रक्तस्राव और आयरन की कमी इसका कारण बन सकती है।
- लगातार थकान, कमजोरी, चक्कर आने और हाथ-पैर ठंडे रहने जैसी दिक्कतें बनी रहती हैं तो डॉक्टर की सलाह से हीमोग्लोबिन और जरूरत के अनुसार आयरन की जांच करानी चाहिए।
अस्थमा और सांस से जुड़ी समस्याएं
किशोरावस्था में अस्थमा का खतरा भी देखा जाता रहा है। सांस की नलियों में सूजन और संवेदनशीलता के कारण ये दिक्कत होती है।
- अस्थमा के शिकार बच्चों-किशोरों में बार-बार सांस फूलने, सीने में जकड़न, खांसी या सांस लेते समय सीटी जैसी आवाज आ सकती है।
- व्यायाम, धूल, धुआं, परागकण या कुछ एलर्जी इसे बढ़ा सकती हैं।
- अगर बच्चे को दौड़ने या खेलते समय बार-बार सांस फूलती है, रात में खांसी आती है या मौसम बदलने पर सांस की परेशानी बढ़ती है, तो समय रहते डॉक्टर से मिलकर इसके कारणों का पता जरूर लगाएं।
किशोरों में टाइप-1 के मामले
डायबिटीज सिर्फ बढ़ती उम्र की बीमारी नहीं है। किशोरों में टाइप-1 डायबिटीज के मामले सबसे ज्यादा रिपोर्ट किए जाते हैं।
- वहीं मोटापा और अस्वस्थ जीवनशैली कुछ बच्चों में टाइप-2 डायबिटीज का जोखिम भी बढ़ा देती है।
- अगर बच्चे को बार-बार पेशाब आने, बहुत ज्यादा प्यास लगने, बिना वजह वजन कम होना, कमजोरी और धुंधला दिखाई देने जैसी दिक्कतें हैं तो शुगर की जांच जरूर करा लें।
- माता-पिता में किसी को डायबिटीज है तो ये खतरा और भी बढ़ जाता है।
हाई ब्लड प्रेशर और थायरॉयड की गड़बड़ी
- लाइफस्टाइल और खान-पान में गड़बड़ी के कारण किशोरों में हाई ब्लड प्रेशर का खतरा भी बढ़ता जा रहा है। इसके कारण अक्सर सिरदर्द, चक्कर आने, धुंधला दिखाई देना या असामान्य थकान जैसी दिक्कतें हो सकती हैं। अगर बच्चे का वजन अधिक है, वह शारीरिक रूप से कम मेहनत करता है और चिप्स या जंक फूड ज्यादा खाता है तो ये चीजें ब्लड प्रेशर का खतरा और भी बढ़ा सकती हैं।
- इसी तरह किशोरों-बच्चों में थायरॉयड की दिक्कत भी हो सकती है। थायरॉयड हार्मोन शरीर की ऊर्जा और कई अन्य प्रक्रियाओं के लिए जरूरी है। थायरॉयड कम होने पर थकान, ठंड लगने, कब्ज और वजन बढ़ने की दिक्कत हो सकती है। वहीं ज्यादा सक्रिय थायरॉयड में वजन कम होने, दिल की धड़कन बढ़े रहने, घबराहट और पसीना ज्यादा आने की समस्या देखी जाती है।
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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस के आधार पर तैयार किया गया है।
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