कोरोना वायरस के संक्रमण से बचने के लिए सुझाए जा रहे तमाम नुस्खों में से एक ये भी है कि अपने हाथ नियमित रूप से साफ करें। मगर, आप ये जान कर हैरान रह जाएंगे कि दुनिया की आबादी का एक बड़ा हिस्सा नियमित रूप से हाथ साफ नहीं करता। यहां तक कि बहुत से लोग हाजत के बाद भी हाथों को साबुन से नहीं धोते। अमरीकी न्यूज चैनल फॉक्स न्यूज के एंकर पीट हेगसेथ अपने विवादों की वजह से ज्यादा चर्चित रहे हैं। लेकिन, हेसगेथ ने पिछले साल ये कह कर हंगामा बरपा दिया था कि मुझे याद नहीं पड़ता कि पिछले दस सालों में मैंने कभी अपने हाथ धोए।
वैसे लोग जो शौच के बाद भी हाथ नहीं धोते, उन्हें कितना भारी पड़ेगा कोरोना वायरस?
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उसी साल, अमेरिका की रिपब्लिकन पार्टी के उत्तरी कैरोलिना राज्य के एक सीनेटर ने कहा कि रेस्टोरेंट में काम करने वालों पर बार-बार हाथ धोने का दबाव बनाना नियमों का दुरुपयोग है। हो सकता है कि 10 साल तक हाथ न धोने वालों की तादाद कम ही हो। जो लोग शौच के बाद नियमित रूप से हाथ धोते हैं, उन्होंने देखा होगा कि उनके आस-पास बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं, जो शौच के बाद भी हाथ नहीं धोते। साल 2015 में हुए एक अध्ययन के अनुसार, दुनिया में करीब 26.2 फीसदी लोग, मल त्याग के बाद साबुन से हाथ नहीं धोते।
लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन ऐंड ट्रॉपिकल मेडिसिन के विशेषज्ञ रॉबर्ट औंगर कहते हैं कि, 'शौच के बाद भी हाथ न धोना एक आम आदत है। आपको पता होना चाहिए कि हम लोग करीब 25 साल से लोगों को इसके लिए प्रेरित कर रहे हैं। लेकिन, अभी भी इस नियम का पालन करने वालों की तादाद बहुत कम है।'
इसकी एक बड़ी वजह ये मानी जाती है कि दुनिया में बहुत से लोगों के पास हाथ धोने की बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं। जैसे कि साबुन और पानी। दुनिया के सबसे कम विकसित देशों में केवल 27 प्रतिशत लोगों के पास ये सुविधाएं हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूनिसेफ का अनुमान है कि दुनिया भर में करीब तीन अरब लोग ऐसे हैं, जिनके पास हाथ धोने के लिए साबुन और पानी की बुनियादी सुविधा नहीं है।
मगर, हाथ न धोने की गंदी आदत का ताल्लुक सिर्फ संसाधनों की उपलब्धता की कमी से नहीं है। जिन देशों में पानी और साबुन दोनों ही पर्याप्त से भी ज्यादा मात्रा में उपलब्ध है। वहां भी आधे लोग ही टॉयलेट जाने के बाद उनका इस्तेमाल करते हैं। इन आंकड़ों के बाद तो शायद आप ये सोचें कि कोहनी छू कर ही अभिवादन करने को कोरोना काल के बाद भी स्थाई तरीका बना दिया जाना चाहिए।
ये आंकड़े तब और हैरान करते हैं, जब आपको ये पता चलता है कि मानवता के इतिहास में हाथ धोने की आदत का आविष्कार, इंसानों की जान बचाने का सबसे कारगर नुस्खा साबित हुआ है। आज दुनिया के कई देशों, जैसे कि ब्रिटेन में इंसानों की औसत उम्र अगर 80 बरस है। जबकि 1850 में ब्रिटेन के लोगों की औसत उम्र चालीस वर्ष हुआ करती थी। ये वही दौर था, जब हाथ धोने के फायदों का सबसे पहले प्रचार शुरू हुआ था। 2006 में हुए एक अध्ययन के अनुसार, अगर आप नियमित रूप से अपने हाथों को अच्छे से साफ करते हैं, तो इससे आपको सांस की बीमारियां होने की आशंका 44 प्रतिशत से घट कर केवल 6 फीसद रह जाती है।
कोविड-19 की महामारी के प्रकोप के बाद वैज्ञानिकों ने पाया है कि जिन देशों में हाथों को नियमित रूप से धोने की संस्कृति है, वहां पर इसका संक्रमण कम हुआ है। आखिर क्या कारण है कि हम में से कई लोग ऐसे हैं, जो हाथ साफ करने को लेकर इतने सजग रहते हैं कि इसके लिए ऊंची कीमत पर भी सैनिटाइजर खरीदने का हौसला रखते हैं। वहीं, बहुत से ऐसे लोग हैं, जिन्हें साबुन से हाथ धोने तक में परेशानी है। अब अगर नए वायरसों के प्रकोप और टीवी के रिमोट पर मल लगे होने जैसे उदाहरण भी उन्हें हाथ धोने के लिए प्रेरित नहीं कर पा रहे, तो फिर उन्हें किस तरह अपनी इस बुरी आदत से छुटकारा पाने के लिए राजी किया जा सकता है?
ऐसा लगता है कि सिंक तक रुक कर हाथ धोने की आदत न होना सिर्फ आलस नहीं है। ये लोगों की सोच से लेकर, अति आत्मविश्वास तक पर निर्भर करता है। फिर उन्हें किन हरकतों से घिन आ सकती है। और अन्य मनोवैज्ञानिक कारण भी हैं, जो लोगों को साफ सफाई पसंद या इनसे परहेज करने वाला बनाते हैं। इन छुपे हुए कारणों का पता लगाने में जुटे विशेषज्ञों को लगता है कि वो इनके जरिए लोगों को साफ सफाई रखने के लिए राजी कर सकेंगे।
रॉबर्ट औंगर कहते हैं कि विकसित देशों में लोग हाथ न धोने की बुरी आदत के बावजूद बीमार होने से बच जाते हैं। अगर आप इसके कारण बीमार पड़ते भी हैं, तो कई दिनों बाद। तब तक लोगों के जहन से ये खयाल निकल जाता है कि हाथ न धोने और बीमारी के बीच ताल्लुक है। रॉबर्ट का कहना है कि, 'कोरोना वायरस के संक्रमण की बात करें तो भी इससे संक्रमित होने और इसके लक्षण सामने आने के बीच पांच छह दिनों का फासला होता है। ऐसे में साफ सफाई न रखने और संक्रमण के बीच संबंध के बारे में सोच पाना मुश्किल होता है।'