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तकनीक का कमाल: लिवर फेलियर वाले मरीजों के लिए अच्छी खबर, इंजेक्शन से शरीर में तैयार होगा 'मिनी लिवर'

Mon, 07 Sep 2026 10:26 PM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: अभिलाष श्रीवास्तव Updated Mon, 07 Sep 2026 10:26 PM IST
सार

इंजीनियरों ने ऐसी इंजेक्शन आधारित तकनीक विकसित की है, जिससे शरीर के भीतर लिवर की छोटी-सी कार्यशील संरचना तैयार की जा सकती है। लिवर फेलियर जैसी समस्या वाले मरीजों  के लिए इसे रामबाण माना जा रहा है। 

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MIT engineers have developed injectable mini liver to help people with liver failure
लिवर के मरीजों के लिए अच्छी खबर - फोटो : Amarujala.com/AI

लिवर फेलियर के ऐसे मरीजों के लिए नई उम्मीद जगी है, जिनके लिए लिवर प्रत्यारोपण यानी लिवर ट्रांसप्लांट संभव नहीं या जिन्हें डोनर अंग के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता है। अमेरिका के मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी) के इंजीनियरों ने ऐसी इंजेक्शन आधारित तकनीक विकसित की है, जिससे शरीर के भीतर लिवर की छोटी-सी कार्यशील संरचना तैयार की जा सकती है। वैज्ञानिक इसे सैटेलाइट लिवर कह रहे हैं। अध्ययन सेल बायोमैटेरियल्स में प्रकाशित हुआ है। 



एमआईटी के इस अध्ययन में चूहों पर परीक्षण किया गया। शोधकर्ताओं ने पाया कि इंजेक्शन से पहुंचाई गई लिवर कोशिकाएं कम से कम आठ सप्ताह तक जीवित रहीं और इस दौरान सामान्य लिवर द्वारा बनाए जाने वाले कई महत्वपूर्ण प्रोटीन और एंजाइम का उत्पादन करती रहीं।

MIT engineers have developed injectable mini liver to help people with liver failure
अध्ययन - फोटो : adobe stock images

लिवर शरीर के करीब 500 जरूरी कार्यों में भूमिका निभाता है। यह रक्त का थक्का बनने को नियंत्रित करने, रक्त से बैक्टीरिया हटाने और दवाओं को संसाधित करने जैसे काम करता है। इनमें कई कार्य हेपेटोसाइट्स नामक विशेष लिवर कोशिकाएं करती हैं।

शोधकर्ताओं ने इन कोशिकाओं को अकेले इंजेक्ट करने के बजाय उनके लिए एक सहायक वातावरण तैयार किया।

  • इसके लिए हेपेटोसाइट्स के साथ बेहद छोटे हाइड्रोजेल माइक्रोस्फीयर और फाइब्रोब्लास्ट नामक सहायक कोशिकाएं मिलाई गईं।
  • माइक्रोस्फीयर कोशिकाओं को एक जगह संगठित रखने और आसपास की रक्त वाहिकाओं से जुड़ने में मदद करते हैं।
  • इस मिश्रण को सिरिंज से शरीर में पहुंचाया जा सकता है।
  • बाहर से दबाव पड़ने पर यह तरल की तरह व्यवहार करता है, जबकि शरीर में पहुंचने के बाद फिर स्थिर संरचना बना लेता है।


नई रक्त वाहिकाओं ने बचाया ऊतक

चूहों में मिश्रण को पेट के भीतर मौजूद वसायुक्त ऊतक में इंजेक्ट किया गया। वहां कोशिकाएं एक सघन संरचना में संगठित हुईं और धीरे-धीरे नई रक्त वाहिकाएं इस ऊतक में विकसित हो गईं। इन्हीं वाहिकाओं से ऑक्सीजन और पोषक तत्व मिलने के कारण लिवर कोशिकाएं जीवित और सक्रिय रहीं।

शोधकर्ताओं के अनुसार इन कोशिकाओं ने रक्त में ऐसे विशेष प्रोटीन भी छोड़े, जिन्हें सामान्य लिवर बनाता है। खास बात यह है कि मिनी लिवर को खराब लिवर के ठीक पास रखना जरूरी नहीं है। पर्याप्त जगह और रक्त आपूर्ति मिलने पर इन्हें शरीर के दूसरे हिस्सों में भी काम करने योग्य बनाया जा सकता है।

भविष्य में प्लीहा या किडनी के आसपास के हिस्सों में इन्हें स्थापित करने की संभावना है।

MIT engineers have developed injectable mini liver to help people with liver failure
लिवर के मरीजों के लिए गुड न्यूज - फोटो : Adobe Stock

प्रत्यारोपण तक बन सकता है सहारा

वैज्ञानिकों के मुताबिक तकनीक कुछ मरीजों में बड़ी सर्जरी के विकल्प के रूप में लिवर के जरूरी कार्यों को अतिरिक्त रूप से संभाल सकती है। वहीं, प्रत्यारोपण की प्रतीक्षा कर रहे मरीजों के लिए यह डोनर अंग मिलने तक पुल का काम कर सकती है।

जरूरत पड़ने पर दोबारा इंजेक्शन से अतिरिक्त ग्राफ्ट देने की संभावना भी सर्जरी की तुलना में आसान हो सकती है।

प्रतिरक्षा तंत्र बड़ी चुनौती

वर्तमान तकनीक में शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली बाहरी लिवर कोशिकाओं पर हमला कर सकती है। इसलिए मरीजों को प्रतिरक्षा-दमनकारी दवाएं देनी पड़ सकती हैं। शोधकर्ता ऐसी स्टेल्थी हेपेटोसाइट्स विकसित करने पर काम कर रहे हैं, जिन्हें प्रतिरक्षा तंत्र आसानी से पहचान न सके। हाइड्रोजेल के जरिए ग्राफ्ट के आसपास ही ऐसी दवाएं पहुंचाने की संभावना भी तलाश रहे हैं।

टीम ने कोशिकाओं को पहुंचाने के लिए अल्ट्रासाउंड-निर्देशित सिरिंज तकनीक विकसित की है। बाद में अल्ट्रासाउंड से यह भी देखा जा सकता है कि ग्राफ्ट शरीर में स्थिर है या नहीं।



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स्रोत:
Injectable “satellite livers” could offer an alternative to liver transplantation


अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।

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