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क्या है पूल टेस्टिंग जो बढ़ा देगी कोरोना जांच की रफ्तार, किन इलाकों में है इसकी संभावना?

Fri, 24 Apr 2020 10:12 AM IST
निलेश कुमार बीबीसी हिंदी
बीबीसी हिंदी Published by: निलेश कुमार Updated Fri, 24 Apr 2020 10:12 AM IST
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what is pool testing for coronavirus and how it works, may help India optimize its strategy for covid 19 test
पूल टेस्टिंग (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : PTI

भारत में कोरोना वायरस के संक्रमण के मामलों की संख्या 21 हजार के पार पहुंच गई है और मरने वालों की संख्या 680 पार हो गई है। राजधानी दिल्ली और मुंबई में सबसे ज्यादा हालत खराब है। दिल्ली में हॉटस्पॉट की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। लॉकडाउन-2 के कुछ दिन निकल गए हैं लेकिन संक्रमण के मामले बढ़ रहे हैं। हालांकि, इस बीच कुछ राज्यों से अच्छी खबरें भी आई हैं।



ऐसे में कोरोना वायरस के मरीजों का जल्द से जल्द पता लगाने के लिए सरकार ने पहले के मुकाबले टेस्टिंग बढ़ा दी है। अब संदिग्ध इलाकों में पूल टेस्टिंग और रैपिड टेस्टिंग के जरिए कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों का पता लगाया जा रहा है।

हाल ही में इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) ने पूल टेस्टिंग के लिए अनुमति दी है। अपनी एडवाइजरी में आईसीएमआर ने लिखा है कि जैसे कोविड 19 के मामले बढ़ रहे हैं, ऐसे में टेस्टिंग बढ़ाना महत्वपूर्ण है। हालांकि, मामले पॉजिटिव आने की दर कम है तो इसमें पूल टेस्टिंग से मदद मिल सकती है।

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कोरोना की जांच - फोटो : Amar Ujala

कैसे होती है पूल टेस्टिंग
पूल टेस्टिंग यानी एक से ज्यादा सैंपल को एकसाथ लेकर टेस्ट करना और कोरोना वायरस के संक्रमण का पता लगाना। पूल टेस्टिंग का इस्तेमाल कम संक्रमण वाले इलाकों में होता है। जहां संक्रमण के ज्यादा मामले हैं वहां पर अलग-अलग जांच ही की जाती है।

आईसीएमआर के दिशा-निर्देशों के मुताबिक अधिकतम पांच लोगों की एकसाथ पूल टेस्टिंग की जा सकती है। कुछ लैब तीन सैंपल लेकर भी टेस्टिंग कर रही हैं। पूल टेस्टिंग के लिए पहले लोगों के गले या नाक से स्वैब का सैंपल लिया जाता है। फिर उसकी टेस्टिंग के जरिए कोविड19 की मौजूदगी का पता लगाया जाता है।

पीजीआईएमएस रोहतक में माइक्रोबायोलॉजी लैब के इंचार्ज डॉक्टर परमजीत गिल पूल टेस्टिंग के लिए तीन सैंपल का इस्तेमाल कर रहे हैं। इससे नतीजे अच्छे और पुख्ता आ रहे हैं। ज्यादा सैंपल लेने से वायरस का पकड़ में आना थोड़ा मुश्किल होता है। हालांकि, आईसीएमआर ने पांच सैंपल लेने की भी अनुमति दी है और इसके लिए सभी सैंपल समान मात्रा में इस्तेमाल होंगे।

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मरीज का सैंपल लेते स्वास्थ्यकर्मी (फाइल फोटो) - फोटो : PTI

डॉक्टर परमजीत गिल बताते हैं, “तीन लोगों के सैंपल लेने के बाद उन्हें मिलाया जाता है। उनसे पहले आरएनए निकाला जाता है। फिर रियल टाइम पीसीआर (आरटी-पीसीआर) टेस्ट किया जाता है। इसमें पहले स्क्रीनिंग होती है। स्क्रीनिंग ई-जीन का पता लगाने के लिए की जाती है। ई-जीन से कोरोना वायरस के कॉमन जीन का पता लगता है।”

“कोरोना वायरस की एक पूरी फैमिली है जिसमें कई तरह के कोरोना वायरस है। इन्हीं में से एक वायरस है कोविड 19। इनका एक कॉमन ई-जीन होता है। अगर टेस्ट में ये ई-जीन पॉजिटिव आता है तो हमें पता लग जाता है कि इस सैंपल में किसी न किसी तरह का कोरोना वायरस मौजूद है लेकिन ये कोविड 19 ही है ये नहीं कह सकते। इसके लिए अगला टेस्ट करना होता है। इसके बाद सिर्फ कोविड 19 का पता लगाने के लिए टेस्ट किया जाता है।”

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कोरोना की जांच (फाइल फोटो) - फोटो : PTI

अगर किसी पूल के नतीजे निगेटिव आते हैं तो इसका मतलब है कि जिन लोगों से उस पूल के लिए सैंपल लिए गए थे उन्हें कोरोना वायरस नहीं है। जिस पूल के नतीजे पॉजिटिव आते हैं उसमें मौजूद सभी सैंपल की फिर से अलग-अलग टेस्टिंग की जाती है।

डॉक्टर गिल के मुताबिक पूल टेस्टिंग के जरिए जहां टेस्टिंग किट बचती हैं वहीं, ज्यादा टेस्टिंग भी हो सकती है। अगर तीन लोगों का पूल टेस्ट नेगेटिव आता है तो बाकी दो के टेस्ट के लिए अलग से किट इस्तेमाल नहीं करनी पड़ेगी। इसमें लगने वाले समय की बात करें तो डॉक्टर गिल के मुताबिक अगर एक सैंपल का टेस्ट करना है तो समय कम लगता है लेकिन पूल टेस्टिंग में समय कुछ घंटे ज्यादा बढ़ जाता है। हालांकि, इस टेस्ट से संसाधन बचते हैं और टेस्टिंग में तेजी आती है।

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किन इलाकों में हो सकती है पूल टेस्टिंग
पूल टेस्टिंग से भले ही जल्दी टेस्टिंग बढ़ सकती है और कई टेस्ट किट्स बचाए जा सकते हैं फिर भी इसे हर जगह नहीं किया जा सकता।

  • पूल टेस्टिंग उन्हीं जगहों पर हो सकती है जहां पर कोरोना वायरस के मामले 2 प्रतिशत से कम हो।
  • जिन जगहों पर पॉजिटिविटी दर 2-5 प्रतिशत है, वहां पर सिर्फ कम्युनिटी सर्वे में या एसिम्पटोमैटिक लोगों के लिए इस्तेमाल होगी। लेकिन, संक्रमित मरीजों के संपर्क में आए लोगों और हेल्थ केयर वर्कर्स के लिए इसका इस्तेमाल नहीं होगा। उनकी अलग-अलग जांच ही की जाएगी।
  • जिन इलाकों में पॉजिटिविटी दर 5 प्रतिशत से ज्यादा है और वहां पर पूल टेस्टिंग का इस्तेमाल नहीं होगा।
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