विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि "जब तक कोरोना वायरस का कोई टीका विकसित नहीं हो जाता, तब तक सोशल डिस्टेंसिंग ही इससे बचने का सबसे कारगर तरीका है।" लेकिन वैज्ञानिकों का एक तबका लगातार ‘हर्ड इम्यूनिटी’ के जरिए इस वायरस को कंट्रोल करने की बात कर रहा है। कोरोना वायरस संक्रमण से प्रभावित ज्यादातर देशों ने सोशल डिस्टेंसिंग को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए लॉकडाउन का रास्ता चुना है लेकिन मुख्यधारा के इस चुनाव को कुछ वैज्ञानिक ये कहते हुए चुनौती दे रहे हैं कि "आखिर कब तक वायरस से छिपकर बैठा जा सकता है?"
Herd Immunity: क्या कोरोना को 'हर्ड इम्यूनिटी' से रोका जा सकता है, भारत में कितनी संभावना?
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‘हर्ड इम्यूनिटी’
इस वैज्ञानिक आइडिया के अनुसार अगर कोई बीमारी किसी समूह के बड़े हिस्से में फैल जाती है तो इंसान की रोग प्रतिरोधक क्षमता उस बीमारी से लड़ने में संक्रमित लोगों की मदद करती है। जो लोग बीमारी से लड़कर पूरी तरह ठीक हो जाते हैं, वो उस बीमारी से ‘इम्यून’ हो जाते हैं, यानी उनमें प्रतिरक्षात्मक गुण विकसित हो जाते हैं।
इम्यूनिटी का मतलब यह है कि व्यक्ति को संक्रमण हुआ और उसके बाद उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता ने वायरस का मुकाबला करने में सक्षम एंटी-बॉडीज तैयार कर लिया। जैसे-जैसे ज्यादा लोग इम्यून होते जाते हैं, वैसे-वैसे संक्रमण फैलने का खतरा कम होता जाता है। इससे उन लोगों को भी परोक्ष रूप से सुरक्षा मिल जाती है जो ना तो संक्रमित हुए और ना ही उस बीमारी के लिए ‘इम्यून’ हैं।
अमरीकी हार्ट एसोसिएशन के चीफ मेडिकल अफसर डॉक्टर एडुआर्डो सांचेज ने अपने ब्लॉग में इसे समझाने की कोशिश की है। वे लिखते हैं, “इंसानों के किसी झुंड (अंग्रेजी में हर्ड) के ज्यादातर लोग अगर वायरस से इम्यून हो जाएं तो झुंड के बीच मौजूद अन्य लोगों तक वायरस का पहुँचना बहुत मुश्किल होता है और एक सीमा के बाद इसका फैलाव रुक जाता है।
मगर इस प्रक्रिया में समय लगता है। साथ ही ‘हर्ड इम्यूनिटी’ के आइडिया पर बात अमूमन तब होती है जब किसी टीकाकरण प्रोग्राम की मदद से अतिसंवेदनशील लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित कर ली जाती है।” एक अनुमान के अनुसार किसी समुदाय में कोविड-19 के खिलाफ ‘हर्ड इम्यूनिटी’ तभी विकसित हो सकती है, जब तकरीबन 60 फीसद आबादी को कोरोना वायरस संक्रमित कर चुका हो और वे उससे लड़कर इम्युन हो गए हों।
क्या ये भारत में संभव है?
वॉशिंगटन स्थित सेंटर फॉर डिजीज डायनेमिक्स, इकोनॉमिक्स एंड पॉलिसी के डायरेक्टर और अमरीका की प्रिंसटन यूनिवर्सिटी के सीनियर रिसर्च स्कॉलर डॉक्टर रामानन लक्ष्मीनारायण ने भारतीय संदर्भ में इसे समझाने की कोशिश की है। उनका मानना है कि "भारत लॉकडाउन को बढ़ाते रहने और कोरोना वायरस के टीके का इंतजार करने की बजाय कोविड-19 को कंट्रोल करने की तरफ बढ़ सकता है जो कि हर्ड इम्यूनिटी नाम की वैज्ञानिक अवधारणा के जरिए संभव है।"
डॉक्टर रामानन लक्ष्मीनारायण ने बीबीसी को बताया, “अगर भारत की 65 प्रतिशत आबादी कोरोना वायरस से संक्रमित होकर ठीक हो जाए, भले ही संक्रमण के दौरान उनमें हल्के या ना के बराबर लक्षण हों, तो बाकी की 35 प्रतिशत आबादी को भी कोविड-19 से सुरक्षा मिल जाएगी।” लेकिन देश की बुजुर्ग और पहले से डायबिटीज या दिल की बीमारी झेल रही आबादी को खतरे में डाले बिना क्या ये संभव है?
इसके जवाब में डॉक्टर रामानन कहते हैं, “भारत की जनसांख्यिकी इस स्थिति में सबसे बड़ी ताकत साबित हो सकती है। भारत में 65 प्रतिशत आबादी 35 वर्ष से कम उम्र की है और केवल 6 प्रतिशत लोगों की आयु 65 वर्ष से अधिक है जबकि इटली में 22 प्रतिशत और चीन में 10 प्रतिशत लोग ज्यादा जोखिम वाले आयु वर्ग के हैं, यानी 65 वर्ष से अधिक उम्र के हैं।”
“वहीं युवाओं में संक्रमण के ज्यादातर मामलों में या तो मरीज में मामूली लक्षण देखने को मिल रहे हैं या फिर उनमें कोई लक्षण नहीं दिखाई दे रहे। अगर इस तबके को सीमित तरीके से कोरोना वायरस से एक्सपोज किया जाए तो भारत के अस्पतालों को शायद मरीजों का उतना बोझ ना झेलना पड़े।”